सड़क हादसे रोकने नई तकनीक अपनाएं, परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक का प्रशासन को निर्देश
राज्य सड़क सुरक्षा परिषद की बैठक में सरनाईक ने एंबुलेंस, ट्रॉमा केयर और हादसों के डेटा एनालिसिस को लेकर कई अहम सूचनाएं दीं।
राज्य में सड़क हादसों और उनमें होने वाली मौतों की संख्या घटाने के लिए आधुनिक तकनीक का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने और अलग-अलग सरकारी विभागों को आपस में तालमेल बिठाकर काम करने के निर्देश परिवहन मंत्री और राज्य सड़क सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष प्रताप सरनाईक ने दिए हैं। मंत्रालय में उनकी अध्यक्षता में 13वीं राज्य सड़क सुरक्षा परिषद की बैठक हुई, जिसमें परिवहन, पुलिस, सार्वजनिक बांधकाम और स्वास्थ्य विभाग समेत तमाम संबंधित यंत्रणाओं को साथ मिलकर हादसे रोकने के उपाय लागू करने पर जोर दिया गया।
बैठक में कहा गया कि हादसे के बाद शुरुआती 'गोल्डन अवर' बहुत अहम होता है, इसलिए इस दौरान घायल को फौरन इलाज मिले, इसे सबसे ऊपर की प्राथमिकता माना जाए। इसके लिए 'पीएम-राहत' योजना को सही तरीके से लागू करने की हिदायत दी गई। बैठक में बताया गया कि इस योजना के तहत एक व्यक्ति को डेढ़ लाख रुपये तक और ज्यादा से ज्यादा सात दिन तक कैशलेस इलाज की सुविधा मिलती है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद इलाज शुरू करने में देरी न हो, इसके लिए पुलिस रजिस्ट्रेशन, डिजिटल पहचान नंबर और इलाज मंजूरी की प्रक्रिया तय समय में पूरी करने के लिए स्वास्थ्य, पुलिस और परिवहन विभाग को मिलकर एक साझा कार्यप्रणाली बनाने को कहा गया।
हादसे के बाद सबसे नजदीक की एंबुलेंस तुरंत मौके पर पहुंचे, इसके लिए 108 सेवा और प्राइवेट एंबुलेंस को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने का प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। मंत्री सरनाईक ने यह भी सुझाव दिया कि एंबुलेंस में कैमरा और टेलीकम्युनिकेशन की सुविधा लगाई जाए, ताकि अस्पताल के डॉक्टर घायल की हालत सीधे देख सकें और मरीज के अस्पताल पहुंचने तक जरूरी इलाज को लेकर गाइड कर सकें।
राज्य के ट्रॉमा केयर सेंटर में स्टाफ, मेडिकल उपकरण और एक्सपर्ट डॉक्टरों की उपलब्धता जांचने के निर्देश दिए गए हैं। हर 50 किलोमीटर के इलाके में सक्षम ट्रॉमा केयर सुविधा मिले, इस दिशा में प्लानिंग पर जोर दिया गया। समृद्धि महामार्ग, एक्सप्रेसवे, तटीय मार्ग और दुर्गम इलाकों में बड़े हादसे होने पर घायलों को फौरन इलाज के लिए एयर एंबुलेंस सेवा की नीति बनाने का सुझाव भी दिया गया।
सड़कों की प्लानिंग, निर्माण और देखभाल के हर चरण में नियमित रोड सेफ्टी ऑडिट की जरूरत बैठक में रेखांकित की गई। सड़कों की इंजीनियरिंग खामियां दूर कर हादसों का खतरा घटाने के लिए सार्वजनिक बांधकाम विभाग के फंड में से 10 प्रतिशत हिस्सा सड़क सुरक्षा के लिए अलग रखने का सुझाव दिया गया। हादसे का समय, जगह, गाड़ी की स्पीड, सड़क की बनावट, लाइटिंग व्यवस्था, पैदल यात्रियों की आवाजाही और ड्राइवर की हालत जैसे डेटा का इस्तेमाल कर वैज्ञानिक स्टडी करने पर भी जोर दिया गया, ताकि हादसों वाले 'ब्लैक स्पॉट्स' पहचान कर वहां तेजी से उपाय पूरे किए जा सकें।
ओवरलोड गाड़ियों पर नियंत्रण के लिए इलेक्ट्रॉनिक 'वे-इन-मोशन' सेंसर का पायलट प्रोजेक्ट चलाने का सुझाव दिया गया है। साथ ही चलती गाड़ियों का प्रदूषण चेक करने के लिए 'पोल्युशन चेक-इन-मोशन' यानी रिमोट सेंसिंग तकनीक के इस्तेमाल पर भी विचार हो रहा है। PUC सर्टिफिकेट को गाड़ी और चालान सिस्टम से हाइब्रिड सॉफ्टवेयर के जरिए जोड़ने के निर्देश दिए गए।
केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय और SaveLIFE Foundation के सहयोग से देश के 100 क्रिटिकल जिलों में सड़क सुरक्षा के उपाय लागू किए जाएंगे। इसमें महाराष्ट्र के नाशिक ग्रामीण, पुणे ग्रामीण, अहिल्यानगर, सोलापुर ग्रामीण, जलगांव, सातारा, छत्रपति संभाजीनगर ग्रामीण, बीड, नागपुर ग्रामीण, कोल्हापुर और धुळे, इन 11 जिलों को शामिल किया गया है। इन जिलों में डेटा के आधार पर एनालिसिस कर हादसों में होने वाली मौतें घटाने का एक्शन प्लान लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।
बैठक में पेश जानकारी के मुताबिक राज्य में गाड़ियों की संख्या बढ़ने के बावजूद जनवरी से जुलाई 2026 के बीच पिछले साल के इसी दौर के मुकाबले हादसों में होने वाली मौतों की संख्या 6 प्रतिशत घटी है। 2025 के आंकड़ों के मुताबिक हादसे में होने वाली मौतों में दोपहिया चालकों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत और पैदल यात्रियों की 22 प्रतिशत रही। इसे देखते हुए दोपहिया चालकों और पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए खास उपाय और ज्यादा असरदार तरीके से लागू करने के निर्देश परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने दिए।