पुणे की मोक्का कोर्ट ने खंडणी केस में निलेश घायवळ समेत सभी आरोपियों को बरी किया
जेल में रहते खंडणी मांगने के आरोप वाले मामले में शिकायतकर्ता और गवाह अपने बयान से पलट गए, सबूत कम पड़े।
पुणे की विशेष मोक्का कोर्ट ने खंडणी के एक मामले में कुख्यात गुंडे निलेश घायवळ समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। मामला इस आरोप पर दर्ज हुआ था कि जेल में रहते हुए खंडणी मांगी गई। सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता अपने शुरुआती आरोपों से पीछे हट गया। बाकी गवाहों और पंचों ने भी सरकारी पक्ष की बात की पुष्टि नहीं की। इसी वजह से कोर्ट ने सबूतों की कमी में यह फैसला सुनाया।
केस की शुरुआत साल 2020 से जुड़ी है। आरोप था कि उस वक्त निलेश घायवळ जेल में था और संतोष धुमाळ ने फरियादी से खंडणी मांगी। बताया गया था कि धुमाळ ने अपने भाई की रैली के लिए जीप देने के नाम पर यह रकम मांगी। क्राइम ब्रांच ने जांच करके इस मामले का खुलासा किया था और उसके बाद इसमें मोक्का के तहत कार्रवाई हुई थी।
लेकिन कोर्ट में सुनवाई के दौरान तस्वीर बदल गई। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि असली शिकायत पुलिस के दबाव में दर्ज कराई गई थी। हाई कोर्ट के आदेश के बाद उसका जो बयान दर्ज हुआ, उसमें भी उसने कहा कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं। इससे सरकारी पक्ष के केस को बड़ा झटका लगा।
दूसरे गवाहों और पंच गवाहों ने भी सरकारी पक्ष के आरोपों का साथ नहीं दिया। कोर्ट ने माना कि मौजूद सबूतों से आरोप साबित नहीं होते। इसलिए विशेष मोक्का कोर्ट ने निलेश घायवळ समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
बताया जाता है कि निलेश घायवळ फिलहाल देश से बाहर है। साल 2025 में कोथरूड इलाके में गोलीबारी और हमलों की घटनाओं के बाद पुणे पुलिस ने घायवळ गैंग के खिलाफ मोक्का के तहत कार्रवाई की थी। खबर है कि उस कार्रवाई के बाद से घायवळ पुलिस के हाथ नहीं लगा है।
घायवळ पर पहले भी कई मामलों में कार्रवाई होने की बात कही जाती है। साल 2021 में पुणे में एक डकैती के मामले में उसे गिरफ्तार किया गया था और उस पर मोक्का के तहत कार्रवाई हुई थी। कहा जाता है कि 2022 में कोर्ट ने उसे जमानत देते वक्त पासपोर्ट पुलिस के पास जमा करने के निर्देश दिए थे। दावा किया गया है कि उसने पासपोर्ट जमा नहीं किया और उसी पासपोर्ट से विदेश चला गया। इससे पहले यह खबर भी आई थी कि घायवळ ने पासपोर्ट के आवेदन में सरनेम की स्पेलिंग बदलकर विदेश यात्रा की।
खंडणी वाले इस मामले में, कुल मिलाकर, शिकायतकर्ता और गवाहों ने आरोपों की पुष्टि नहीं की और सबूत अधूरे रहे। इसी आधार पर कोर्ट ने घायवळ समेत सभी आरोपियों को निर्दोष मानकर बरी कर दिया।