पुलिस आयुक्तालय की जमीन पर 20 करोड़ लेने का आरोप, मीरा-भाईंदर महापालिका सवालों में
टीडीआर से मुफ्त मिली जमीन के बदले राज्य के पुलिस विभाग से 20 करोड़ 6 लाख 92 हजार 720 रुपये लेने का आरोप लगा है।
मीरा-भाईंदर महापालिका पर आरोप लगा है कि उसने मीरा-भाईंदर-वसई-विरार पुलिस आयुक्तालय के लिए जमीन देते वक्त राज्य सरकार के पुलिस विभाग से 20 करोड़ 6 लाख 92 हजार 720 रुपये लिए। यह जमीन आरक्षण के तहत टीडीआर (हस्तांतरणीय विकास हक) के जरिए महापालिका को मुफ्त मिली थी। इस मामले से महापालिका की जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
दावा किया जा रहा है कि एकीकृत विकास नियंत्रण व प्रोत्साहन नियमावली (यूडीसीपीआर) के मुताबिक अगर आरक्षित जमीन सरकारी विभाग के लिए हो, तो उसे मुफ्त देना चाहिए। इसके बावजूद महापालिका ने बाजार भाव से रकम ली, ऐसा आरोप है। पत्रकार और समाजसेवी धीरज परब ने सरकार को शिकायत दी है। उनकी मांग है कि सरकार को हुए आर्थिक नुकसान के आरोप की जांच हो, रकम महापालिका से वापस ली जाए और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई हो।
मिली जानकारी के मुताबिक मीरा रोड के प्लेजेंट पार्क इलाके में आरक्षण क्रमांक 331, 332, 333, 334 और 335 की जमीन पर पुलिस आयुक्तालय का दफ्तर बनाने का फैसला महापालिका की महासभा में हुआ था। फैसले के समर्थन में कहा गया था कि शहर के लोगों की सुविधा के लिए पुलिस आयुक्तालय जरूरी है। इसके लिए इन आरक्षणों में बदलाव कर जगह उपलब्ध कराई गई।
इन पांच आरक्षणों का कुल क्षेत्रफल 11 हजार 815 वर्ग मीटर बताया जाता है। इनमें से 7 हजार 364 वर्ग मीटर जमीन महापालिका के कब्जे में थी। यह जमीन टीडीआर के जरिए मिली थी, इसलिए आपत्ति उठाई गई है कि पुलिस आयुक्तालय जैसे सार्वजनिक काम के सरकारी दफ्तर के लिए इसे मुफ्त दिया जाना चाहिए था।
आरोप है कि इस जमीन के लिए बाजार भाव के हिसाब से 20 करोड़ 6 लाख 92 हजार 720 रुपये लिए गए। बताया जाता है कि यह सौदा रजिस्टर्ड है और महापालिका के तत्कालीन प्रभारी शहर अभियंता दीपक खांबित तथा तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त विलास सानप के बीच 19 जनवरी 2022 को दस्तावेज क्रमांक 872/2022 के तहत आखिरी करार हुआ। शिकायत करने वालों का दावा है कि जमीन महापालिका को टीडीआर से बिना किसी सीधे नकद भुगतान के मिली थी। इसलिए सवाल उठ रहा है कि सरकार के ही पुलिस विभाग से इतनी बड़ी रकम लेने की जरूरत क्या थी।
यूडीसीपीआर के पेज क्रमांक 225 पर मौजूद कलम 11.2.12 का हवाला दिया जा रहा है। यह नियमावली 2020 में मंजूर हुई थी। दावा है कि इस प्रावधान के मुताबिक टीडीआर से हासिल आरक्षित जमीन राज्य सरकार या उसके विभाग के लिए आरक्षित हो, तो उसे संबंधित विभाग को मुफ्त देने का प्रावधान है। यह नियम इस खास सौदे पर कैसे लागू होता है और महासभा के ठराव व रजिस्टर्ड करार पर इसका क्या कानूनी असर होगा, इसकी आधिकारिक जांच जरूरी बताई गई है।
इस पर महापालिका के प्रभारी शहर अभियंता दीपक खांबित ने कहा कि पुलिस आयुक्तालय के लिए आरक्षण करने और आरक्षित जगह पुलिस को देने का फैसला महासभा में हुआ था। उनके मुताबिक जगह का मोबदला महासभा के फैसले के अनुसार ही लिया गया है।
धीरज परब के मुताबिक उन्होंने जुलाई में सरकार को शिकायत दी थी। उनका आरोप है कि महापालिका ने जनहित के नाम पर सरकार से बड़ी मात्रा में सरकारी जमीनें मुफ्त ली हैं, जबकि पुलिस आयुक्तालय के दफ्तर के लिए सरकार के ही पुलिस विभाग से बाजार भाव वसूला गया, जो विरोधाभास है। अब लोगों की नजर इस पर है कि राज्य सरकार का नगरविकास विभाग, गृह विभाग और पुलिस प्रशासन जांच करेंगे या नहीं, और नियमों का उल्लंघन मिला तो 20 करोड़ रुपये वापस लिए जाएंगे या नहीं। अंतिम तस्वीर सरकारी जांच रिपोर्ट, दस्तावेजों की पड़ताल और सभी पक्षों के रुख से ही साफ होगी।