नाशिक के आंदोलन में सदावर्ते बोले, उपवर्गीकरण नहीं होने दूंगा
नाशिक में उपवर्गीकरण के खिलाफ हुए आंदोलन में वकील गुणरत्न सदावर्ते ने अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण का कड़ा विरोध किया और कई दावे किए।
अनुसूचित जातियों के आरक्षण में उपवर्गीकरण के मुद्दे पर महाराष्ट्र में माहौल गर्म है। कई जगह मोर्चे और आंदोलन चल रहे हैं। इसी बीच नाशिक में उपवर्गीकरण के खिलाफ हुए आंदोलन में जाने-माने वकील गुणरत्न सदावर्ते (Gunratna Sadawarte) शामिल हुए। अपने भाषण में उन्होंने उपवर्गीकरण का तीखा विरोध किया।
सदावर्ते ने कहा, "मैं डंके की चोट पे बोलता हूं। वर्गीकरण की राजनीति चल रही है, लेकिन मैं वर्गीकरण होने नहीं दूंगा। मैं आंबेडकरी वकील हूं। मैं जो बोलता हूं, वही करता हूं।"
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए सदावर्ते ने उपवर्गीकरण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनके कहने के मुताबिक वर्गीकरण के लिए संबंधित पिछड़ा वर्ग रिपोर्ट और जरूरी प्रक्रिया अहम है।
सदावर्ते ने दावा किया, "आज आपने वर्गीकरण किया तो कल दोपहर तीन बजे रद्द कर दूंगा।" शीर्षक में आए "48 घंटे में फैसला रद्द करने" का दावा भी उन्हीं का है। इधर, सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में अनुसूचित जातियों के उपवर्गीकरण को संवैधानिक रूप से मंजूरी देते हुए राज्यों को सबूतों पर आधारित प्रक्रिया अपनाने की छूट दी थी।
मातंग समाज के बारे में भी सदावर्ते ने बात की। उन्होंने दावा किया, "ट्रिपल टेस्ट हुआ तो मातंग समाज अनुसूचित जाति से बाहर चला जाएगा।"
एकनाथ शिंदे पर भी सदावर्ते ने निशाना साधा। उन्होंने कहा, "एकनाथ शिंदे जैसे पांच आ जाएं, तब भी वर्गीकरण नहीं होगा।" उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को राजनीति छोड़कर मातंग समाज की मांगों पर ध्यान देना चाहिए। मातंग समाज को आर्थिक और औद्योगिक मौके मिलें, इसके लिए उन्होंने MIDC में समाज के लोगों को प्लॉट देने की मांग भी की।
अलग-अलग चर्चाओं में सामने आया है कि उपवर्गीकरण का मुद्दा सिर्फ दो समाजों के बीच टकराव का नहीं है। यह अनुसूचित जातियों के अंदर आरक्षण के फायदों के बंटवारे से जुड़ा है। मातंग समाज की तरफ से अनुसूचित जातियों के आरक्षण में अलग उपवर्ग बनाने की मांग जोर पकड़ रही है।
फिलहाल राज्य में इस मसले पर दो अलग-अलग राय दिख रही हैं। मातंग समाज के संगठन उपवर्गीकरण की मांग कर रहे हैं, जबकि इसका विरोध करने वाले संगठन अनुसूचित जातियों की एकता का मुद्दा उठा रहे हैं। इसलिए आगे भी यह मुद्दा चर्चा में रहने की संभावना है।