नागपुर सेंट्रल जेल में क्षमता से 46 फीसदी ज्यादा कैदी, RTI में खुलासा
आरटीआई से मिली जानकारी में नागपुर सेंट्रल जेल समेत महाराष्ट्र की जेलों में भारी ओवरक्राउडिंग सामने आई है।
नागपुर सेंट्रल जेल अपनी तय क्षमता से कहीं ज्यादा कैदियों को रखकर चल रही है। आरटीआई एक्ट के तहत मिली जानकारी के मुताबिक इस जेल में 1,940 कैदियों की क्षमता के मुकाबले 2,836 कैदी बंद हैं। यानी ओवरक्राउडिंग का लेवल करीब 46 फीसदी तक पहुंच गया है।
यह आंकड़े इंस्पेक्टर जनरल ऑफ प्रिजन्स की तरफ से एक्टिविस्ट अभय कोलारकर की आरटीआई अर्जी के जवाब में दिए गए हैं। यह डेटा 31 अगस्त 2026 तक जेल में मौजूद कैदियों की संख्या पर आधारित है।
नागपुर अकेला ऐसा मामला नहीं है। पूरे महाराष्ट्र की जेलों में यही हालत है। राज्य की नौ सेंट्रल जेलों की कुल क्षमता 16,045 कैदियों की है, लेकिन इनमें फिलहाल 27,979 कैदी बंद हैं। यह तय क्षमता से करीब 75 फीसदी ज्यादा है।
राज्य की 37 डिस्ट्रिक्ट जेलों में हालत इससे भी ज्यादा खराब है। इनकी कुल क्षमता 7,482 कैदियों की है, जबकि वहां 11,365 कैदी रखे गए हैं। यानी ऑक्युपेंसी तय क्षमता के 150 फीसदी से भी ज्यादा हो गई है।
नागपुर सेंट्रल जेल में क्षमता और असल कैदियों की संख्या के बीच का फर्क 896 कैदियों का है। यानी यहां तय संख्या से डेढ़ गुना के करीब कैदी रखे जा रहे हैं। इतनी ज्यादा भीड़ होने पर जेल प्रशासन के लिए सुरक्षा, हेल्थकेयर, सफाई और कैदियों के रिहैबिलिटेशन जैसी बुनियादी सुविधाएं देना मुश्किल हो जाता है।
महाराष्ट्र की दूसरी सेंट्रल जेलों में भी हालात गंभीर हैं। मुंबई सेंट्रल प्रिजन में सबसे ज्यादा दबाव दर्ज हुआ है। यहां 999 कैदियों की क्षमता के मुकाबले 3,399 कैदी बंद हैं, यानी तय क्षमता से तीन गुना से भी ज्यादा।
ठाणे सेंट्रल प्रिजन में 1,111 की क्षमता के मुकाबले 3,330 कैदी हैं। येरवडा सेंट्रल प्रिजन में कैदियों की कुल संख्या राज्य में सबसे ज्यादा है, यहां 2,767 की क्षमता के मुकाबले 6,396 कैदी बंद हैं। नासिक रोड सेंट्रल प्रिजन में 3,208 की क्षमता के मुकाबले 3,938 कैदी हैं, जबकि तलोजा सेंट्रल प्रिजन में 2,324 की क्षमता के मुकाबले 3,222 कैदी रखे गए हैं।
आरटीआई के आंकड़ों से यह भी साफ हुआ कि ओवरक्राउडिंग की सबसे बड़ी वजह पुरुष कैदियों की संख्या है। सेंट्रल जेलों में पुरुष कैदियों के लिए 15,426 की क्षमता तय है, लेकिन असल में 27,195 पुरुष कैदी बंद हैं। डिस्ट्रिक्ट जेलों में भी यही फर्क दिखता है, जहां 6,937 की क्षमता के मुकाबले 10,922 पुरुष कैदी हैं।
कुछ डिस्ट्रिक्ट जेलों में तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं। कल्याण डिस्ट्रिक्ट जेल में सिर्फ 540 कैदियों की क्षमता है, लेकिन वहां 2,054 कैदी बंद हैं, यानी तय संख्या से करीब चार गुना ज्यादा। जलगांव डिस्ट्रिक्ट जेल में 274 की क्षमता के मुकाबले 751 कैदी हैं, वहीं उस्मानाबाद डिस्ट्रिक्ट जेल में 109 की क्षमता के मुकाबले 261 कैदी बंद हैं। यवतमाल डिस्ट्रिक्ट जेल में भी 248 की क्षमता के मुकाबले 556 कैदी होने से भारी दबाव है।
यह आंकड़े बताते हैं कि यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की दिक्कत है। कैदियों की संख्या लगातार क्षमता से ज्यादा बनी रहने से जेल प्रशासन के सामने सुरक्षा, हेल्थकेयर, सफाई, खाना, रहने की जगह और रिहैबिलिटेशन जैसी सुविधाएं मैनेज करना बड़ी चुनौती बन गया है, वो भी ऐसे ढांचे में जो इतनी बड़ी संख्या के लिए बनाया ही नहीं गया था। नागपुर सेंट्रल जेल में 896 कैदियों का यह अतिरिक्त बोझ शहर के करेक्शनल इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ रहे दबाव की एक बड़ी मिसाल है।