मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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17:26 IST

नागपुर में मंजूरी में देरी से फ्लैट महंगे, एनआईटी और रेरा की सुस्ती से बिल्डर परेशान

नागपुर में प्रोजेक्ट मंजूरी में देरी से बिल्डरों की लागत बढ़ रही है और फ्लैट महंगे हो रहे हैं।

नागपुर में मंजूरी में देरी से फ्लैट महंगे, एनआईटी और रेरा की सुस्ती से बिल्डर परेशान
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

महाराष्ट्र सरकार खुद को तेज-तर्रार दिखाने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री से लेकर पालक मंत्री तक प्रक्रियाओं को रफ्तार देने के दावे करते रहते हैं, लेकिन जमीन पर हालात इससे बिल्कुल उलट हैं। मनपा, एनआईटी और रेरा के अधिकारियों के कामकाज ने इन दावों की पोल खोल दी है।

इन विभागों में फाइल जमा करने के बाद प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने में एक-एक साल लग जा रहा है। इससे एक तरफ प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाती है, दूसरी तरफ बिल्डरों को अतिरिक्त ब्याज भरते रहना पड़ता है।

अगर सरकारी तंत्र तेज हो जाए तो ग्राहकों को कम कीमत पर फ्लैट मिल सकता है और उनका अपने घर का सपना भी जल्दी पूरा हो सकता है। जानकारों का कहना है कि नागपुर सुधार प्रन्यास यानी एनआईटी और मनपा की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।

अगर कोई प्रोजेक्ट जनवरी में मंजूरी के लिए जमा किया जाता है तो पूरे साल इंतजार करना पड़ता है, और इसके बाद भी मंजूरी मिलने की गारंटी नहीं होती। बिल्डरों के मुताबिक आज के दौर में एक अच्छे प्रोजेक्ट की मंजूरी के लिए बिल्डर 5 से 10 करोड़ रुपये तक जमा कर रहे हैं, फिर भी समय पर मंजूरी नहीं मिल पाती। एक तरफ सरकार अफोर्डेबल हाउसिंग की बात करती है, दूसरी तरफ देरी से लागत बढ़ाने में कर्मचारी अपना पूरा योगदान दे रहे हैं।

नागपुर जिले के पूर्व अध्यक्ष गौरव अग्रवाला बताते हैं कि पहले बिल्डर सिर्फ दो विभागों से परेशान थे, लेकिन अब रेरा जैसी संस्था भी परेशानी की वजह बन गई है। उनके मुताबिक यहां भी अलग तरह का खेल शुरू हो गया है, जिसकी वजह से प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने में 3-4 महीने लगने लगे हैं, जबकि पहले यह काम 1 महीने में हो जाता था। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन प्रक्रिया होने के बावजूद रेरा में दलाल सक्रिय होने लगे हैं, जिनकी वजह से पूरे तंत्र को नुकसान हो रहा है।

अग्रवाला के मुताबिक एक बिल्डर करोड़ों रुपये में जमीन खरीदता है, फिर प्रोजेक्ट मंजूरी के लिए संबंधित विभागों में फाइल डालता है। यहां करोड़ों रुपये जमा करने के बाद भी मंजूरी कब मिलेगी, इसकी कोई जानकारी नहीं होती। किस्मत अच्छी हो तो एक साल में मंजूरी मिल जाती है, और उसके बाद बिल्डर रेरा में अप्लाई करता है। अप्लाई करने के बाद यहां फाइल लटक जाती है और बिल्डर को भारी आर्थिक नुकसान यानी ब्याज उठाना पड़ता है। पूरी प्रक्रिया देखकर लगता है कि रेरा को सरकारी एजेंसियों, मनपा और एनआईटी पर भरोसा नहीं है।

बिल्डरों का कहना है कि अप्लाई करते वक्त जो नंबर अस्थायी तौर पर दिया जाता है, उसी आधार पर प्रोजेक्ट की मार्केटिंग की अनुमति मिल जानी चाहिए। इससे बिल्डरों का समय और पैसा दोनों बचेगा, और इसका फायदा सीधे ग्राहकों को मिलेगा।

दिलचस्प बात यह है कि रेरा की सुस्ती का खामियाजा सरकारी विभागों जैसे म्हाडा, मनपा और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जैसी सरकारी संस्थाओं को भी उठाना पड़ रहा है। इनके प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने के बाद भी रेरा रजिस्ट्रेशन लेने में 3-4 महीने का वक्त लग जाता है। साफ कहें तो अभी रेरा को सरकारी विभाग, अधिकारी या कर्मचारियों पर भरोसा ही नहीं रह गया है, प्रक्रियाओं को जानबूझकर उलझाया जा रहा है और इसका नुकसान पूरे प्रॉपर्टी मार्केट को उठाना पड़ रहा है।

अग्रवाला ने कहा कि अगर कोई बिल्डर यह योजना बनाए कि अगले साल गणपति या नवरात्रि में स्कीम लॉन्च करनी है, तो यह उसके लिए सपने से कम नहीं है, क्योंकि पहले बिल्डरों को एनओसी के जाल में फंसाया जाता है, फिर फाइलें अलग-अलग विभागों की टेबलों से गुजरती हैं, और अंत में जब मुहर लगने की बारी आती है तो बिल्डर खुद भूल चुका होता है कि उसे प्रोजेक्ट कब लॉन्च करना था या मार्केटिंग कब शुरू करनी थी। यही शहर के विभागों की असली तस्वीर है।

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