मुलुंड में जमीन की फर्जी एंट्री का मामला, महसूल मंत्री बावनकुळे के ध्यान में आने के बाद केस दर्ज
मुलुंड में 2013-2015 की कथित विवादित फेरफार एंट्री की जांच के बाद पुलिस ने केस दर्ज किया है।
मुंबई के मुलुंड इलाके में जमीन के सरकारी रिकॉर्ड से जुड़ा एक पुराना मामला अब फिर से चर्चा में आ गया है। साल 2013 और 2015 के दौरान हुई कथित विवादित फेरफार एंट्री और उनसे जुड़े कागजातों की जांच के बाद 11 सितंबर 2026 को मुलुंड पश्चिम पुलिस स्टेशन में अपराध क्रमांक 1091/2026 दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। एफआईआर के मुताबिक यह मामला 2013 से 2015 के बीच की घटनाओं से जुड़ा है, जिसमें कई गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।
बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र के महसूल मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे ने इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर कथित गड़बड़ी की जांच कर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे। इस केस में मंडल अधिकारी सागर भीमराव भालेरकर का नाम सुमोटो शिकायतकर्ता के तौर पर दर्ज किया गया है। शिकायत के अनुसार अर्चना भल्ला, मनीष बावा, सुमित बावा, एन. ए. पाटकर और उस वक्त के घाटकोपर मंडल अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।
इससे पहले आशिक अमीरअली मर्चंट लंबे समय से इन फेरफार एंट्री और कागजातों को लेकर सवाल उठाते हुए प्रशासन से जांच की मांग कर रहे थे। उपलब्ध रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि 25 अगस्त 2025 को इसी सिलसिले में मुलुंड पुलिस स्टेशन में शिकायत की गई थी। इसके बाद मामला महसूल प्रशासन तक पहुंचा और संबंधित एंट्री की जांच शुरू हुई।
इस पूरे विवाद के केंद्र में फेरफार एंट्री नंबर 5186 और 5286 हैं। शिकायत में 1991 के पुराने कोर्ट रिकॉर्ड और कागजातों का हवाला देते हुए, बाद में महसूल रिकॉर्ड में की गई एंट्री पर सवाल उठाए गए हैं। मुलुंड के सर्वे नंबर 1000 और उससे जुड़ा प्लॉट भी इस जांच का हिस्सा बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि कुछ कागजातों के आधार पर सरकारी रिकॉर्ड में फेरफार किया गया, जबकि उन्हीं कागजातों की सच्चाई और वैधता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
अब जांच में इन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे, यह कागजात किसने बनाए, यह महसूल दफ्तर तक कैसे पहुंचे, इनकी सच्चाई किसने जांची, फेरफार एंट्री किस आधार पर की गई और पूरी प्रक्रिया में किस किसकी भूमिका थी। दर्ज एफआईआर में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 193, 196, 201, 204, 420, 465, 467, 468, 471, 120 बी और 34 शामिल की गई हैं। इस मामले की जांच पुलिस इंस्पेक्टर मायादेवी सुकुमार कलगावे को सौंपी गई है।
यही बात इस मामले को और गंभीर बना देती है। अगर यह सिर्फ दो पक्षों के बीच जमीन की मालिकाना हक का विवाद होता, तो इसकी शक्ल अलग होती। लेकिन यहां आरोप सरकारी महसूल रिकॉर्ड में कथित गलत कागजातों के आधार पर फेरफार करने तक पहुंच गए हैं। अगर जांच में आरोप साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ निजी जमीन विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महसूल रिकॉर्ड बनाने, उसकी पड़ताल करने और उसमें बदलाव करने की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया भी जांच के दायरे में आ सकती है।
इस मामले को महाराष्ट्र के अब तक के सबसे बड़े जमीन या महसूल घोटालों में से एक बताया जा रहा है, हालांकि उपलब्ध एफआईआर और कागजातों से फिलहाल यह दावा पक्के तौर पर साबित नहीं होता। इसलिए अभी इसे बड़े पैमाने के कथित गड़बड़ी की जांच का मामला मानना ज्यादा सही होगा। जांच में मूल फेरफार फाइल, संबंधित एप्लिकेशन, आदेश, अधिकारियों की एंट्री, कन्वेयंस डीड, पुराने कोर्ट कागजात, पत्राचार और बाकी महसूल रिकॉर्ड की पड़ताल अहम साबित होगी।