मिरा-भाईंदर में पांच इमारतों से शुरू होगा स्वयंपुनर्विकास, नरेंद्र मेहता की पहल पर शिविर
मिरा-भाईंदर की 30 साल से पुरानी इमारतों के लिए स्वयंपुनर्विकास का रास्ता खोलने की कोशिश तेज हुई है। शुरुआत पांच इमारतों के प्रायोगिक प्रोजेक्ट से होगी।
मिरा-भाईंदर शहर में 30 साल से ज्यादा पुरानी और पुनर्विकास का इंतजार कर रही इमारतों के लिए अब स्वयंपुनर्विकास का विकल्प रखने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसके लिए स्वयंपुनर्विकास को बढ़ावा देने का फैसला लिया गया है।
स्वयंपुनर्विकास मंडल के अध्यक्ष और आमदार प्रवीण दरेकर ने बताया कि शुरुआत में शहर की पांच इमारतों का प्रायोगिक तौर पर स्वयंपुनर्विकास करके दिखाने का संकल्प किया गया है।
इस फैसले की पृष्ठभूमि में कई दिक्कतें हैं। बिल्डरों से मतभेद होते हैं, प्रक्रिया अटक जाती है, पैसों के लेन-देन को लेकर सवाल उठते हैं, और पुनर्विकास के दौरान रहवासियों को कई साल अपने घर से दूर रहना पड़ता है।
मिरा-भाईंदर में पिछले कई सालों में बड़े पैमाने पर शहरीकरण हुआ है और यहां की कई पुरानी इमारतें अब पुनर्विकास के मोड़ पर पहुंच चुकी हैं। लेकिन बिल्डर का चुनाव, करार की शर्तें, परमिशन, पैसों का हिसाब और बाकी प्रशासकीय प्रक्रिया की वजह से कई प्रोजेक्ट रुक जाते हैं। कुछ जगहों पर पुनर्विकास के नाम पर रहवासियों के साथ धोखाधड़ी की शिकायतें भी सामने आई हैं। इसीलिए लोगों के सामने यह विकल्प रखने की कोशिश चल रही है कि वे अपने घर का पुनर्विकास खुद अपने नियंत्रण में करें।
इसी पृष्ठभूमि में आमदार नरेंद्र मेहता की पहल पर मिरा रोड पूर्व के एस. के. स्टोन डोम में स्वयंपुनर्विकास मार्गदर्शन शिबिर रखा गया। शहर की अलग-अलग हाउसिंग सोसायटियों के पदाधिकारी, सदस्य और रहवासी बड़ी संख्या में पहुंचे। महापौर डिंपल मेहता और आमदार नरेंद्र मेहता भी मौजूद रहे।
स्वयंपुनर्विकास में पुनर्विकास की जिम्मेदारी और नियंत्रण संबंधित हाउसिंग सोसायटी के पास रहता है। इससे बिना बिल्डर के प्रोजेक्ट चलाने का रास्ता खुल जाता है। सही प्लानिंग और जानकारों के मार्गदर्शन से रहवासियों को उनके मौजूदा घर के क्षेत्रफल से ज्यादा जगह मिलने की संभावना भी बन सकती है।
शिबिर में जानकारों और संबंधित अधिकारियों ने स्वयंपुनर्विकास की प्रक्रिया, जरूरी सरकारी परमिशन, मंजूरी, पैसों की प्लानिंग, बैंकों से मिलने वाली आर्थिक मदद, निर्माण की प्रक्रिया और कानूनी पहलुओं पर जानकारी दी। सोसायटी पदाधिकारियों के कई सवालों के जवाब दिए गए, जिससे स्वयंपुनर्विकास को लेकर जो उलझन थी, उसे दूर करने में यह शिबिर अहम साबित हुआ।
बताया गया कि मुंबई में 20 से ज्यादा, ठाणे में चार और वसई-विरार में एक प्रोजेक्ट समेत अलग-अलग इलाकों में स्वयंपुनर्विकास के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। उसी तर्ज पर मिरा-भाईंदर में भी शासन के स्तर पर जरूरी सहयोग दिया जाएगा। अगर पांच इमारतों का यह प्रायोगिक प्रोजेक्ट कामयाब रहा, तो शहर की बाकी पुरानी इमारतों के लिए भी स्वयंपुनर्विकास का रास्ता खुलने की संभावना है। इसलिए शहर की पुरानी हाउसिंग सोसायटियों की नजर अब इस प्रयोग पर टिकी है।