मीरा-भाईंदर: घोडबंदर डिपो में सालों से खड़ी दस कचरा गाड़ियां, वापर नहीं, जंग लगने लगी
मीरा-भाईंदर महानगरपालिका के घोडबंदर बस डिपो में कचरा उठाने के लिए खरीदी गई दस घंटागाड़ियां सालों से बिना इस्तेमाल खड़ी हैं।
मीरा-भाईंदर महानगरपालिका के घोडबंदर बस डिपो में कचरा संकलन के लिए खरीदी गई पूरी दस घंटागाड़ियां सालों से बिना इस्तेमाल खड़ी मिली हैं। महापालिका के परिवहन उपक्रम के इस डिपो में इन गाड़ियों पर धूल जमी हुई है। नियमित इस्तेमाल न होने से इनकी हालत बिगड़ती दिख रही है।
इन गाड़ियों पर लिखा है कि इन्हें परिवहन मंत्री और विधायक प्रताप सरनाईक के विशेष फंड से खरीदा गया है। शहर की कचरा संकलन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बड़ी रकम खर्च करके गाड़ियां खरीदी जाती हैं। लेकिन अगर ये गाड़ियां सड़क पर उतरने के बजाय डिपो में ही पड़ी रहें, तो इस खर्च का मकसद क्या रहा, यह सवाल उठ रहा है।
डिपो में खड़ी इन घंटागाड़ियों के पीछे के हिस्से में, जहां कचरा भरा जाता है, बारिश का पानी जमा हुआ दिखता है। लंबे समय तक पानी जमा रहने से लोहे के हिस्सों में जंग लगना शुरू हो गया है, ऐसा दावा किया गया है। अगर गाड़ियों का नियमित इस्तेमाल और रखरखाव नहीं हुआ, तो उनके मशीनी और बाहरी हिस्सों को नुकसान हो सकता है। जनता के पैसे से खरीदी गई गाड़ियां इस्तेमाल न होने से खराब हो रही हैं, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है, यह सवाल अब नागरिक पूछ रहे हैं।
मामले का एक और गंभीर पहलू रजिस्ट्रेशन का है। दावा किया गया है कि इन घंटागाड़ियों का अब तक वाहन रजिस्ट्रेशन हुआ ही नहीं है। रजिस्ट्रेशन पूरा नहीं हुआ तो ये गाड़ियां अधिकृत तौर पर सड़क पर कब उतरेंगी, यह सवाल खड़ा हुआ है। खरीद, रजिस्ट्रेशन, बीमा, फिटनेस और असल इस्तेमाल की प्रक्रिया में आखिर कौन सी चीज अटकी है, इस पर महापालिका प्रशासन को साफ जानकारी देनी चाहिए।
मीरा-भाईंदर में कचरा संकलन और ढुलाई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा अहम मुद्दा है। कई इलाकों से नियमित कचरा उठाने की मांग हो रही है, और दूसरी तरफ कचरा ढोने के लिए खरीदी गई गाड़ियां ही बिना इस्तेमाल पड़ी हैं। महापालिका ने इन गाड़ियों पर पैसा खर्च किया है, तो उनका सही योजना से इस्तेमाल करना और ठीक से रखरखाव करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। सालों तक डिपो में खड़ी रहने से उनकी उम्र पर ही असर पड़ने का खतरा है।
लोग जानना चाहते हैं कि ये घंटागाड़ियां किस साल खरीदी गईं, इन पर कितना पैसा खर्च हुआ, विशेष फंड से कितनी रकम मिली, रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं हुआ, गाड़ियों को चलाने के लिए कौन सी प्रक्रिया बाकी है और इतने समय तक उनका रखरखाव कैसे हुआ। इन सब सवालों के जवाब महापालिका प्रशासन से अपेक्षित हैं। गाड़ियों पर विशेष फंड से खरीद का जिक्र है, इसलिए इस खरीद में पारदर्शिता की मांग भी उठ सकती है।
एक तरफ कहा जाता है कि शहर के कचरा प्रबंधन के लिए नई गाड़ियां चाहिए, दूसरी तरफ मौजूद घंटागाड़ियां डिपो में धूल खा रही हैं। इसलिए नागरिक पूछ रहे हैं कि ये गाड़ियां ठीक कब से सेवा में आएंगी, उनके रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया कब पूरी होगी और अब तक हुए नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है।
उम्मीद जताई जा रही है कि महापालिका प्रशासन इस पूरे मामले की ठोस जानकारी सामने रखे और खरीद से आज तक का खर्च, रजिस्ट्रेशन की मौजूदा स्थिति और असल इस्तेमाल की योजना साफ करे। वरना चिंता यह है कि नागरिकों के पैसे से खरीदी गई गाड़ियां इस्तेमाल न होने से खराब होकर आखिर में कबाड़ में न चली जाएं।