मौसम अध्ययन: कोकण-गोवा में गर्म मानसून पट्टा बढ़ा, पानी के नियोजन पर असर का सवाल
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के 'मौसम' अध्ययन के मुताबिक पश्चिम विदर्भ और मराठवाड़ा अर्ध-शुष्क पट्टे में गए, कोकण-गोवा में गर्म मानसून पट्टा फैला।
एल निनो के असर से इस बार बारिश के मौसम में कमी दिखी है, और अब एक नया संकट भी सामने आ रहा है। पश्चिम विदर्भ और मराठवाड़ा में अर्ध-शुष्क पट्टे के बढ़ने और कोकण-गोवा में गर्म मानसून जलवायु पट्टे के फैलने के संकेत मिले हैं। इस वजह से पानी के भाप बनकर उड़ने की रफ्तार बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जलग्रहण क्षेत्रों में साठा पहले से कम है, ऐसे में तेज बाष्पीभवन हुआ तो पानी की किल्लत और गंभीर होगी।
यह बात भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के 'मौसम' नाम के शोध अध्ययन से सामने आई है। अध्ययन के मुताबिक भारत के जलवायु क्षेत्रों के स्वरूप में लंबे समय से बदलाव हो रहा है। इसमें दर्ज है कि महाराष्ट्र का पश्चिम विदर्भ और मराठवाड़ा अब अर्ध-शुष्क जलवायु के पट्टे में आ गए हैं, जबकि कोकण और गोवा में गर्म मानसून जलवायु का पट्टा बढ़ा है।
यह शोध वरिष्ठ वैज्ञानिक कृष्णानंद होसालीकर समेत पांच वैज्ञानिकों ने किया है। इसमें 1951 से 2020 के बीच के तापमान के रिकॉर्ड का अध्ययन रखा गया है। शोध के मुताबिक 1961-1990 के दौर के मुकाबले 1991-2020 के दौर में पश्चिम विदर्भ और मराठवाड़ा का जलवायु वर्ग गर्म स्वरूप से अर्ध-शुष्क की तरफ खिसका दिखता है। दूसरी तरफ कोकण और गोवा में गर्म मानसून जलवायु क्षेत्र का विस्तार दर्ज हुआ है।
इसके चलते मुंबई समेत महाराष्ट्र के बांधों, तालाबों, पीने के पानी के स्रोतों और जलग्रहण क्षेत्रों का नियोजन बदलते मौसम के हिसाब से परखने की जरूरत और साफ हो गई है। बारिश की मात्रा, तीव्रता या बंटवारा बदला तो बांधों के जलग्रहण क्षेत्रों में जमा होने वाले पानी पर असर पड़ सकता है। कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हुई तो बड़ी मात्रा में पानी बह जाने की आशंका रहती है, और बारिश में लंबा खंड पड़ा तो जलाशयों के दोबारा भरने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। बढ़ते तापमान से बाष्पीभवन की रफ्तार बढ़ने की भी संभावना रहती है।
मुंबई को पानी देने वाले तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र में बारिश, तापमान और बाष्पीभवन पर लंबे समय तक नजर रखना ज्यादा अहम हो जाता है। मराठवाड़ा और विदर्भ के जलाशयों के लिए भी पानी की उपलब्धता का अंदाजा, भूजल का पुनर्भरण और सिंचाई का नियोजन करते वक्त बदलते मौसम का ध्यान रखना होगा।
हालांकि जलवायु क्षेत्र का वर्गीकरण बदलना और बांधों में असल में पानी घटना, ये दो अलग बातें हैं। ये निष्कर्ष यह साबित नहीं करते कि महाराष्ट्र के हर हिस्से में पानी की किल्लत बढ़ी है। फिर भी वे क्षेत्रीय मौसम में आ रहे बदलावों को जल प्रबंधन के नजरिए से परखने की जरूरत साफ करते हैं। महाराष्ट्र के जलाशयों पर ठीक कितना असर होगा, यह तय करने के लिए स्थानीय बारिश, तापमान, बाष्पीभवन और जलग्रहण क्षेत्रों के अलग-अलग आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी है। इस शोध से इतना साफ है कि पानी का नियोजन करते समय सिर्फ पुरानी औसत पर टिके रहना ठीक नहीं, बदलते मौसम के संभावित असर को भी हिसाब में लेना होगा।