जनजागृती के बावजूद पुणे में विसर्जन जुलूस के दौरान डीजे का शोर पिछले साल से 12 डेसिबल बढ़ा
सीओईपी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के सर्वे में लक्ष्मी रोड पर औसतन 104.5 डेसिबल आवाज दर्ज, जो तय सीमा से कई गुना ज्यादा है।
पुणे में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान लक्ष्मी रोड और आस-पास के इलाकों में ध्वनि प्रदूषण फिर एक बार गंभीर स्तर पर पहुंच गया है। सीओईपी टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि इस बार आवाज पिछले साल के मुकाबले और बढ़ गई, जबकि पुलिस की तरफ से जनजागृती अभियान, बैठकें और आंदोलन भी बड़े पैमाने पर चलाए गए थे।
रिपोर्ट के मुताबिक लक्ष्मी रोड के दस बड़े चौराहों पर जुलूस के दौरान औसतन 104.5 डेसिबल की आवाज रिकॉर्ड हुई। पिछले साल यानी 2025 में यह आंकड़ा 92.6 डेसिबल था, इस हिसाब से इस बार आवाज में पूरे 12 डेसिबल की बढ़ोतरी हुई है। जुलूस से पहले ही डीजे और बढ़ते ध्वनि प्रदूषण का मसला चर्चा में था, लेकिन असल जुलूस में ढोल-ताशा पथकों, डीजे, डॉल्बी और लाउडस्पीकरों के शोर से पूरा मध्य इलाका गूंज उठा।
सीओईपी के अप्लाइड साइंस एंड ह्यूमैनिटीज डिपार्टमेंट के हेड महेश शिंदीकर की गाइडेंस में स्टूडेंट कोऑर्डिनेटर मेहेर और आयुष ने विसर्जन जुलूस के दौरान अलग-अलग समय पर आवाज की नोटिंग की। यह मापन बेलबाग, गणपती, लिंबराज, कुंटे, उंब्र्या, गोखले, शेडगे, होळकर, टिळक और खंडोजीबाबा चौक पर किया गया।
इस बार दोपहर चार बजे से रात बारह बजे तक के समय में आवाज की तीव्रता खासतौर पर बढ़ी हुई पाई गई। सभी चौराहों की औसत आवाज दोपहर चार बजे 113.4 डेसिबल, रात आठ बजे 111.9 डेसिबल और रात बारह बजे 112.6 डेसिबल दर्ज हुई। उंब्र्या चौक पर दोपहर चार बजे 115.2 डेसिबल तो गोखले चौक पर रात आठ बजे 115.4 डेसिबल तक आवाज पहुंच गई।
अलग-अलग चौराहों की बात करें तो होळकर चौक पर 106.8, शेडगे विठोबा चौक पर 106.3, टिळक चौक पर 105.5, गोखले चौक पर 104.4, खंडोजीबाबा चौक पर 104.2, उंब्र्या चौक पर 104.1, बेलबाग चौक पर 104.0, लिंबराज महाराज चौक पर 103.5, गणपती चौक पर 103.3 और कुंटे चौक पर 102.8 डेसिबल औसत आवाज रिकॉर्ड हुई।
पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2022 में 105.2 डेसिबल, 2023 में 101.2 डेसिबल, 2024 में 94.8 डेसिबल, 2025 में 92.6 डेसिबल और अब 2026 में 104.5 डेसिबल आवाज दर्ज हुई है, यानी दो साल तक कमी के बाद इस साल फिर बड़ी बढ़ोतरी देखी गई।
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की गाइडलाइन के मुताबिक कमर्शियल इलाकों में दिन में 65 और रात में 55 डेसिबल, जबकि रेजिडेंशियल इलाकों में दिन में 55 और रात में 45 डेसिबल की सीमा तय है। सीओईपी की स्टडी में मिली 104.5 डेसिबल की औसत आवाज इन तय सीमाओं से कई गुना ज्यादा है।
ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए प्रशासन की तरफ से जो प्लानिंग की गई थी, वह असल जुलूस में कितनी कारगर रही, इस पर सवाल उठने लगे हैं। हर चौराहे पर आवाज कंट्रोल करने के लिए इंतजाम होने की उम्मीद थी, फिर भी कई जगह डीजे और लाउडस्पीकरों के बीच शोर की होड़ लगी रही। इसके साथ ही सड़क पर भीड़ और ट्रैफिक जाम की वजह से विसर्जन जुलूस के दौरान एंबुलेंस को भी रुकावट का सामना करना पड़ा। इस वजह से ध्वनि प्रदूषण के साथ-साथ जुलूस की प्लानिंग पर भी लोगों ने सवाल उठाए हैं।