बुधवार, 4 नवंबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट

गौरी पूजा: महाराष्ट्र में हर इलाके में अलग रिवाज, जानिए तरह-तरह की परंपराएं

गौरी पूजा: महाराष्ट्र में हर इलाके में अलग रिवाज, जानिए तरह-तरह की परंपराएं तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

गणपति आगमन के बाद महाराष्ट्र और कर्नाटक में गौरी पूजन की परंपरा है, अलग-अलग समाज में इसका तरीका अलग-अलग है।

महाराष्ट्र में गणपति के आगमन के बाद गौरी पूजन की परंपरा चली आ रही है, और यह परंपरा कर्नाटक में भी देखने को मिलती है। खास बात यह है कि हर समाज और हर इलाके में गौरी का रूप, पूजा का तरीका और नैवेद्य अलग-अलग होता है।

कोकणस्थ और कऱ्हाडे ब्राह्मण परिवारों में खड्यांच्या गौरी की पूजा होती है। नदी किनारे से पांच या सात चिकने पत्थर लाकर उनकी पूजा की जाती है। घर की बहू-बेटी या कुंवारी लड़की गौर को घर लाती है। दहलीज पर उसकी आरती उतारकर रांगोळी के पैरों के निशान पर से उसे घर के अंदर लाया जाता है। घर के हर कमरे में गौर को घुमाया जाता है और रसोईघर, अनाज, गहने, किताबों की अलमारी जैसी घर की समृद्धि दिखाई जाती है। "यहां क्या है?" ऐसा पूछने पर जवाब मिलता है "उदंड है यानी भरपूर है।" आने वाले दिन खीर का, दूसरे दिन घावन-घाटले या पुरणावरणाचा, और विदाई के दिन करंजी का भोग लगाया जाता है।

विदर्भ में गौरी को महालक्ष्मी कहते हैं। देशस्थ ब्राह्मणों के घर में उभ्या गौरी होती हैं, जबकि विदर्भ में इन्हें महालक्ष्मी बोला जाता है। पीतल, चांदी या दूसरी धातु के मुखौटे अनाज की राशि पर रखकर बहू-बेटियां उन्हें घर लाती हैं। यहां ज्येष्ठा और कनिष्ठा नाम की दो महालक्ष्मी की स्थापना होती है, जिन्हें साड़ी, गहने और श्रृंगार से सजाया जाता है। महापूजा के दिन सोलह तरह की पत्तियां, फूल, अलग-अलग सब्जियां, चटनी, सलाद, पुरणपोळी और पंचपकवान का भोग लगाया जाता है। विदर्भ में आंबिल भी इस नैवेद्य की खासियत है। विदाई के समय "मम गृहे स्थिरा भव" यानी मेरे घर में स्थिर रहो, ऐसी प्रार्थना की जाती है।

कोल्हापुर इलाके में तांब्यावरच्या गौरी की परंपरा है। कोकण के सारस्वत समाज में गौरी को गणपति की मां माना जाता है और महादेव के साथ उसका आगमन गणेशोत्सव से पहले ही हो जाता है।

चांद्रसेनीय कायस्थ प्रभू यानी सीकेपी समाज में तेरडा और पत्थरों की गौरी पूजी जाती है। घर की बहू-बेटी ही गौर को घर लाती है। तेरडा और सात पत्थर सूप में लेकर आई बहू-बेटी के पैरों पर दूध-पानी डालकर, आरती उतारकर घर में लाया जाता है। कुमकुम मिले पानी की परात में पैर डुबोकर ही उसे घर में आना होता है। पूरे घर में खींची रांगोळी के पैरों पर लाल पैरों के निशान बनाते हुए बहू-बेटी चलती है। घर की गृहलक्ष्मी हर कमरे में उसकी आरती उतारती है, हाथ पर चीनी रखकर पूछती है, "गौरी, गौरी कहां आई?" तब गौर जवाब देती है। इस तरह पूरा घर देख लेने के बाद गौर को गणपति के बगल में बिठाया जाता है। फिर उसे मुखौटा लगाकर साड़ी पहनाकर सजाया जाता है। सुहाग की सामग्री के साथ नारियल-सुपारी रखकर गौरी की ओटी भरी जाती है। पहले दिन खीर, सब्जी, रोटी का भोग होता है, दूसरे दिन पुरणपोळी का भोग होता है। तीसरे दिन खीर और मुरड घातलेला कान्होला का भोग लगाया जाता है।

बहुजन समाज की परंपरा में कोकण के किसान समाज में तेरडा की पत्तियों से एक प्रतिमा बनाकर उस पर मिट्टी का मुखौटा लगाया जाता है। बहुजन समाज में मिट्टी के मटकों की उतरंड रचकर गौरी की पूजा की जाती है। कोकणस्थ मराठा समाज में हल्दी का खंभा और गौरी का मुखौटा कुएं पर ले जाकर पूजा करके बाजे-गाजे के साथ घर लाने की प्रथा है।

गौरी पूजा की इन तरह-तरह की परंपराओं से महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विविधता की झलक मिलती है। पूजा, भोग, रूप और विधि भले अलग-अलग हों, मगर गौर के स्वागत के पीछे की भावना एक ही होती है यानी मायके आई इस जगन्माता को प्यार, सम्मान और अपनेपन से विदा करना। इसीलिए गौरी सिर्फ पूजा की देवी नहीं है, बल्कि हर घर की बेटी, मां और समृद्धि का मंगल प्रतीक मानी जाती है।

#नागपुर#कल्चर#PT24#Culture#Nagpur

विज्ञापन

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप 'आप' पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे