'दुर्गे दुर्घट भारी' आरती किसने रची और इसकी पहली पंक्तियों का मतलब क्या है
नवरात्री के दिनों में घरों और मंडलों में गूंजने वाली इस आरती के रचनाकार समर्थ रामदास माने जाते हैं।
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नवरात्री का त्योहार नौ दिन चलता है और इन दिनों में देवी के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। दूसरी माला के दिन माता ब्रह्मचरिणी देवी की पूजा होती है, जिसका महत्व तपस्या, संयम और भक्ति से जुड़ा बताया गया है। इन्हीं दिनों कई घरों और मंडलों में 'दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारी' आरती का स्वर जोर-जोर से गूंजता है। लेकिन इस आरती का सही अर्थ क्या है और इसे किसने लिखा, यह कितने लोग जानते हैं।
कहा जाता है कि यह आरती समर्थ रामदास ने 17वीं सदी में रची थी। कथा के मुताबिक समर्थ रामदास स्वामी जब तुलजापुर में तुलजाभवानी माता के दर्शन के लिए गए थे, तब उन्हें यह आरती सूझी। उस दौर में एक के बाद एक कई संकट आ रहे थे और सारे नागरिक घबराए हुए थे। उन्हें थोड़ी हिम्मत मिले और उनमें लड़ने की ताकत आए, इसलिए समर्थ ने देवी की शक्ति का वर्णन करते हुए यह आरती रची। देवी कितनी शक्तिशाली हैं और अपने भक्तों की पुकार पर कैसे दौड़ी आती हैं, यह उन्होंने इस आरती के जरिए बताया।
पहली पंक्ति का अर्थ समर्थ रामदास ने बहुत गहराई से सोचकर बताया है। 'दुर्गे दुर्घट भारी' यानी हे दुर्गा माता, यह जीवन बहुत कठिन है। 'तुजविण संसारी अनाथ नाथे' का मतलब है कि तुम्हारे बिना इस दुनिया में हम अनाथ हैं। तुम ही हमारी माँ हो, तुम ही हमारा आधार हो। जब जिंदगी में दुख का पहाड़ टूट पड़ता है और कोई रास्ता नहीं दिखता, तब सिर्फ तुम ही हमें बचा सकती हो, यही इसका अर्थ है।
आरती की अगली पंक्तियों में रामदास स्वामी ने देवी के अलग-अलग रूपों का वर्णन किया है। उनके हाथों में शस्त्र हैं, गले में मोतियों की मालाएं हैं और माथे पर कुंकू है। वे दिखने में कितनी सुंदर हैं और साथ ही कितनी शक्तिशाली हैं, यह समर्थ ने बताया है। उन्होंने महिषासुर नाम के बड़े राक्षस को मारा और इस तरह सभी देवताओं और इंसानों को सुख दिया। वे संकट से बचाने वाली हैं।
आखिरी कड़ी में समर्थ रामदास स्वामी खुद को एक छोटा बच्चा मानते हैं और देवी से कहते हैं कि मैं अज्ञानी हूं, मुझे कुछ समझ नहीं आता। मुझे इस संसार के मोह और डर से बाहर निकालो। मुझे बस तुम्हारे चरणों की सेवा करने दो, तुम्हारी भक्ति करने दो। इतनी सीधी-सादी मांग वे देवी से करते हैं।
इसीलिए यह आरती 300-400 साल बाद भी लोगों की जुबान पर है। जब हम यह आरती गाते हैं, तो सिर्फ शब्द नहीं बोलते, बल्कि हर पंक्ति का अर्थ समझते हुए यह भी जान पाते हैं कि देवी से अपनी कौन सी इच्छा मांगनी है। सबकी श्रद्धा है कि देवी जरूर दुख दूर करती हैं। इस आरती पर गाना भी बना है।
यह आरती 2005 में आई केदार शिंदे की फिल्म 'अगं बाई अरेच्चा!' में गाने के रूप में आई है। इस गाने का संगीत अजय-अतुल ने दिया है।