मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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18:00 IST

दुर्गम इलाकों के छात्रों के लिए एसटी की 100 नई मिडी बसें, संकरे रास्तों पर चलेंगी

महाराष्ट्र राज्य मार्ग परिवहन महामंडल की गाड़ी अब घने जंगल और पहाड़ी इलाकों तक पहुंचेगी, ताकि आदिवासी छात्रों को रोज दस-पंद्रह किलोमीटर पैदल न चलना पड़े।

दुर्गम इलाकों के छात्रों के लिए एसटी की 100 नई मिडी बसें, संकरे रास्तों पर चलेंगी
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

महाराष्ट्र के दूर-दराज के गांवों, पहाड़ी इलाकों और संकरी घुमावदार पगडंडियों तक अब लालपरी यानी एसटी बस की पहुंच और बढ़ने जा रही है। परिवहन मंत्री और एसटी निगम के अध्यक्ष प्रताप सरनाईक ने बताया कि महाराष्ट्र राज्य मार्ग परिवहन निगम के बेड़े में 100 पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी मिडी बसें शामिल की जाएंगी। इनका मकसद आदिवासी नागरिकों, ग्रामीण जनता और छात्रों के सफर को आसान बनाना है, खासकर उन इलाकों में जहां बड़ी बसें नहीं पहुंच पातीं।

मंत्री सरनाईक के मुताबिक "एसटी वहां एसटी" यानी जहां जरूरत, वहां एसटी सिर्फ एक नारा नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र के आखिरी छोर तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट पहुंचाने का निगम का पक्का इरादा है। जिन गांव-बस्तियों के आदिवासी परिवार और छात्र आज भी पढ़ाई, नौकरी, अस्पताल और रोजमर्रा के कामों के लिए कई किलोमीटर पैदल चलते हैं, उन्हें अब इस लालपरी का साथ मिलेगा। सरनाईक ने साफ कहा कि दुर्गम इलाकों की पगडंडियों पर एसटी की राह बनाना ही इस फैसले के पीछे की सोच है।

मंत्री ने बताया कि पहाड़ों, तेज चढ़ाई-उतराई, संकरे रास्तों और घुमावदार मोड़ों की वजह से कई जगहों पर बड़ी बसें पहुंच ही नहीं पातीं। इसका नतीजा यह होता है कि वहां रहने वाले आदिवासी लोगों को, और खासकर स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों को, पढ़ाई के लिए हर रोज 10 से 15 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। छात्रों की पढ़ाई की राह में इस पैदल चलने की मुश्किल को दूर करने और दुर्गम इलाकों के लोगों को सुरक्षित, भरोसेमंद पब्लिक ट्रांसपोर्ट देने के लिए ही 28 सीटों वाली मिडी बसें ऐसे कठिन रास्तों पर चलाने का फैसला लिया गया है।

ये मिडी बसें उन्हीं रास्तों पर चलेंगी जहां बड़ी बसों का पहुंचना मुश्किल है। एसटी निगम का कहना है कि रास्ता जितना भी संकरा हो, चढ़ाई जितनी भी तेज हो या मोड़ जितना भी कठिन हो, यात्रियों की सेवा के लिए लालपरी के पहिए रुकेंगे नहीं।

मंत्री सरनाईक ने यह भी माना कि इन रास्तों पर बस सेवा चलाना आर्थिक रूप से फायदे का सौदा नहीं होगा, फिर भी नफा-नुकसान के गणित से ज्यादा जरूरी आदिवासी परिवारों और छात्रों की पैदल चलने की मजबूरी को खत्म करना है। उन्होंने कहा, "पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिर्फ नफे-नुकसान के हिसाब से मापने वाली सर्विस नहीं है, यह समाज से जुड़ी जिम्मेदारी है। अगर किसी छात्र का स्कूल तक रोज पैदल चलना बच जाए, अगर किसी आदिवासी परिवार का बाजार, अस्पताल या शहर तक का सफर आसान हो जाए, तो उस सेवा की कीमत सिर्फ पैसों में नहीं आंकी जा सकती।"

उन्होंने आगे कहा कि "गांव वहां एसटी" यानी जहां गांव, वहां एसटी, यह पहचान निगम की बरसों पुरानी है। लेकिन आजादी के 80 साल बाद भी पहाड़ों में बसे कई आदिवासी बस्तियों तक एसटी की सेवा अब तक नहीं पहुंची है। मिडी बसों के जरिए इन बस्तियों को जोड़ना सिर्फ ट्रांसपोर्ट देना नहीं है, बल्कि उन्हें पढ़ाई, अस्पताल, नौकरी और विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का काम है।

मंत्री सरनाईक ने कहा कि लालपरी की यह दौड़ सिर्फ किलोमीटर मापने वाली दौड़ नहीं, बल्कि इंसानों के बीच की दूरी कम करने वाली दौड़ है। यह छात्रों के कदमों को पढ़ाई की दिशा देती है, आदिवासी परिवारों की जिंदगी को विकास से जोड़ती है और दुर्गम महाराष्ट्र को मुख्य धारा से जोड़ती है। उन्होंने कहा, "यात्रियों की सेवा ही एसटी की पहली प्राथमिकता है, इस मूलमंत्र को असल में उतारते हुए महाराष्ट्र के आखिरी छोर तक एसटी पहुंचाने के लिए जरूरी सारे फैसले लिए जाएंगे।"

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