मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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17:26 IST

डॉक्टर से समझौते पर हाईकोर्ट ने पांच आरोपियों की सजा और दोषसिद्धि रद्द की

नागपुर खंडपीठ ने डॉक्टर और आरोपियों के बीच स्वेच्छा से हुए समझौते के आधार पर 2016 की दोषसिद्धि और 2022 का अपीलीय फैसला रद्द किया।

डॉक्टर से समझौते पर हाईकोर्ट ने पांच आरोपियों की सजा और दोषसिद्धि रद्द की
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

डॉक्टर से विवाद के एक पुराने मामले में दोषी ठहराए गए पांच लोगों को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस मेहरोज पठान ने आदेश देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता डॉक्टर और आरोपियों के बीच स्वेच्छा से समझौता हो चुका है और यह मामला गंभीर या जघन्य अपराध की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए दोषसिद्धि और उसके बाद दिया गया अपीलीय फैसला दोनों रद्द किए जाते हैं।

कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि अगर किसी को दोषी ठहराया जा चुका है और उस दोषसिद्धि के खिलाफ अपील या पुनरीक्षण जैसी कानूनी कार्यवाही अभी भी पेंडिंग है, तो पीड़ित पक्ष के स्वेच्छा से समझौता कर लेने पर सही मामलों में कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर आपराधिक कार्यवाही खत्म कर सकता है। हालांकि जस्टिस पठान ने यह भी कहा कि हर मामले के तथ्य और अपराध की प्रकृति देखकर ही ऐसा फैसला बहुत सोच-समझकर लिया जाना चाहिए।

यह पूरा मामला हिंगणघाट कोर्ट से जुड़ा है। 26 फरवरी 2016 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, हिंगणघाट ने नितिन उर्फ बंटी जांगले, कुनाल जावड़े, सुभाष सोयाम, विकास उर्फ विक्की मुनेश्वर और अनिल मून को विभिन्न धाराओं के तहत दोषी करार दिया था और तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इन पर IPC की धारा 143, 147, 452, 448, 294, 323, 506 के साथ धारा 149 और महाराष्ट्र मेडिकेयर सेवा संस्थान अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप लगे थे।

निचली कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपियों ने सेशन कोर्ट में अपील की थी। सुनवाई के बाद सेशन कोर्ट ने दोषसिद्धि तो बरकरार रखी, लेकिन सजा घटाकर एक साल के सश्रम कारावास कर दी और हर आरोपी पर 5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। इस फैसले से नाखुश आरोपी बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ पहुंचे और पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान डॉक्टर और आरोपियों के बीच हुआ समझौता कोर्ट के सामने रखा गया। डॉक्टर ने खुद कोर्ट को बताया कि उन्होंने किसी दबाव में नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से समझौता किया है और अब वह पुराना विवाद हमेशा के लिए खत्म कर शांति से आगे बढ़ना चाहते हैं। डॉक्टर की तरफ से समझौते के लिए कोई शर्त भी नहीं रखी गई थी।

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रामावतार मामले के फैसले का हवाला भी दिया और कहा कि दोषसिद्धि के बाद समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल बहुत सावधानी से करना पड़ता है। इसके लिए अपराध की प्रकृति, चोट या घटना कितनी गंभीर थी, समझौता सच में स्वेच्छा से हुआ है या नहीं, और आरोपियों का बर्ताव कैसा रहा, यह सब देखना जरूरी होता है। साथ ही यह शक्ति तभी इस्तेमाल हो सकती है जब दोषसिद्धि के खिलाफ अपील या कोई और कानूनी रास्ता कोर्ट में पहले से पेंडिंग हो।

तथ्यों और समझौते को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि यह समझौता स्वेच्छा से हुआ है और अपराध गंभीर या जघन्य श्रेणी में नहीं आता। इसी आधार पर कोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 2016 की दोषसिद्धि और 2022 में सेशन कोर्ट के अपीलीय फैसले को रद्द कर दिया।

राहत के साथ हाईकोर्ट ने एक शर्त भी जोड़ी है। आदेश के मुताबिक हर आरोपी को दो हफ्ते के भीतर 10 हजार रुपये हाईकोर्ट लीगल एड सब-कमेटी में जमा करने होंगे। इस शर्त के पालन को लेकर मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर को होगी।

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