दीक्षाभूमि के विकास में देरी पर हाई कोर्ट सख्त, NMRDA और प्रन्यास को चेतावनी
बुधवार की सुनवाई में जजों ने कहा कि इसी रफ्तार से काम चला तो दीक्षाभूमि का विकास 50-60 साल में भी पूरा नहीं होगा।
दीक्षाभूमि के सौंदर्यीकरण और सर्वांगीण विकास की योजना पर हाई कोर्ट ने प्रन्यास और नागपुर महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (NMRDA) के कामकाज पर कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को हुई सुनवाई में अदालत ने साफ कहा कि अब सिर्फ कागजी जानकारी से काम नहीं चलेगा।
न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश रजनीश व्यास ने मौखिक रूप से तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अगर हर बार वही पुराने जवाब दिए जाते रहे और काम इसी गति से चलता रहा, तो दीक्षाभूमि का विकास अगले 50-60 साल में भी पूरा नहीं हो पाएगा।
दीक्षाभूमि के सर्वांगीण विकास के लिए जनहित याचिका साल 2018 में दायर की गई थी। सुनवाई में NMRDA की तरफ से जो जानकारी रखी गई, उससे अदालत संतुष्ट नहीं हुई। कोर्ट ने मौखिक रूप से यह नाराजगी भी जताई कि प्रशासनिक प्रक्रिया में जितनी पारदर्शिता दिखनी चाहिए, उतनी दिखाई नहीं देती।
दीक्षाभूमि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के ऐतिहासिक धम्मदीक्षा आंदोलन से जुड़ी अहम जगह है। हर साल यहां देशभर से बड़ी संख्या में अनुयायी पहुंचते हैं। इसी वजह से परिसर के विकास, सौंदर्यीकरण, यातायात व्यवस्था, श्रद्धालुओं की सुविधाओं और दूसरी बुनियादी व्यवस्थाओं के लिए लंबे समय से अलग-अलग स्तर पर योजनाएं बनती रही हैं।
NMRDA ने कोर्ट को बताया कि दीक्षाभूमि के पुनर्विकास और सौंदर्यीकरण के लिए मेसर्स संदीप काबले आर्किटेक्ट्स एंड प्लानर्स को प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट (पीएमसी) नियुक्त किया गया है। प्राधिकरण के मुताबिक परियोजना के डिजाइन में बदलाव हुआ, इसलिए नई ई-निविदा प्रक्रिया अपनानी पड़ी।
इस प्रक्रिया में संदीप कांबले पात्र पाए गए। उन्हें परियोजना लागत के दो प्रतिशत की दर से पीएमसी बनाया गया है। उन्हें 15 जुलाई 2026 को ऑफर लेटर दिया गया, जबकि 29 जुलाई 2026 को आधिकारिक करार की प्रक्रिया पूरी हुई।
अदालत ने साफ संकेत दिया कि बैठकों, निविदाओं और कागजी कार्रवाई की जानकारी देने के बजाय अगली सुनवाई तक जमीन पर सकारात्मक प्रगति दिखनी चाहिए। अगर अगली सुनवाई में ठोस प्रगति नजर नहीं आई, तो दोनों नोडल एजेंसियों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।
इस मामले की पिछली सुनवाई 10 अगस्त को हुई थी। तब याचिकाकर्ता के अधिवक्ता शैलेश नारनवरे ने अदालत से कहा था कि दीक्षाभूमि का विकास सिंगापुर और दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के शहरों की तर्ज पर करने की योजना है। ऐसे में इतने अहम ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक स्थल के विकास की प्रक्रिया का सालों तक अटके रहना गंभीर बात है।