तुकाराम मुंढे बोले, मेरे बच्चे नेता या उद्यमी बनें, प्रशासनिक सेवा में न जाएं
आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे ने एक इंटरव्यू में कहा कि वे अपने बच्चों को राजनीति या कारोबार में भेजना चाहते हैं।
आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे का नाम सुनकर अच्छे-अच्छे घबरा जाते हैं। वे जिस विभाग में जाते हैं, वहां के लोगों में उनका डर बैठ जाता है। अब अन्न और औषधि प्रशासन विभाग में आने के बाद उन्होंने सड़क किनारे के ठेलों से लेकर बड़े रेस्टोरेंट के मालिकों तक की नाक में दम कर रखा है। लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वालों को उन्होंने अपने पद की सख्ती दिखा दी है। इसीलिए चर्चा है कि अफसर हो तो तुकाराम मुंढे जैसा। कई नौजवान भी उन्हीं की तरह आईएएस बनने का सपना देख रहे हैं।
लेकिन खुद मुंढे चाहते हैं कि उनके बच्चे राजनेता बनें। इसकी वजह भी उन्होंने खुद बताई है। यह बात उन्होंने एक इंटरव्यू में कही, जब वे पिंपरी चिंचवड में बोल रहे थे।
उनसे पूछा गया था कि क्या आप चाहते हैं कि आपकी तरह आपके बच्चे भी प्रशासनिक सेवा में जाएं। इस पर उन्होंने सीधे मना कर दिया। मुंढे ने कहा कि आगे चलकर मेरे बच्चे नेता या उद्यमी बनें, ऐसा मैं चाहता हूं। मैं उन्हें राजनीति या व्यापार में रमने की सलाह दूंगा। आज की जेन जी को ऐसे रास्ते चुनने चाहिए, जहां उन पर कोई प्रशासनिक बंधन न हो। तब आप समाज के लिए बिना किसी दबाव के और खुले मन से काम कर पाएंगे।
मुंढे ने कहा कि अगर मेरे बच्चे मुझसे पूछें कि क्या उन्हें प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहिए, तो मैं उन्हें साफ कह दूंगा कि बिल्कुल मत बनो। उनका मानना है कि सिस्टम के किसी भी दबाव के बिना बच्चे समाज के विकास में योगदान दे पाएंगे। जनसेवा के लिए राजनीति और उद्योग, ये दोनों क्षेत्र बहुत अच्छे हैं। आज की युवा पीढ़ी के पास असीमित ऊर्जा और ज्ञान है। इसलिए ऐसे करियर में उन्हें नहीं फंसना चाहिए, जहां उनकी आजादी चौखट में बंधकर रह जाए।
मुंढे के 21 साल के करियर में 25 तबादले हो चुके हैं। उनकी ईमानदारी का असर उनके परिवार पर भी पड़ा है। उनके मुताबिक उनका बेटा पांचवीं कक्षा में पहुंचने तक उसे छह बार स्कूल बदलना पड़ा। बार-बार के तबादलों से उनकी पत्नी को भी बहुत परेशानी झेलनी पड़ी।
मुंढे ने कहा कि जनसेवा का यह कठिन रास्ता मैंने ही चुना था और मैं इन मुश्किल हालात का सामना करने के लिए तैयार था। मगर इस दौरान उनके परिवार को बड़ा त्याग करना पड़ा। इसी वजह से वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे इस रास्ते पर चलें।
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