सोशल मीडिया पर नफरत और अफवाहों का जोर, असली आवाजें दबाने का खतरा
अमेरिका से यूरोप तक नफरत और हिंसा में सोशल मीडिया की भूमिका पर बहस तेज है। पत्रकार संगठन चेता रहे हैं कि सख्ती में असली आवाजें न दब जाएं।
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अमेरिका के इलिनॉय राज्य के ऑरोरा शहर में श्री वेंकटेश्वर स्वामी हिंदू मंदिर पर 11 अक्टूबर को गोली चलाने की कोशिश हुई थी। इसके बाद इस बात पर बहस छिड़ गई है कि नफरत फैलाने वाले अभियानों में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कैसे हो रहा है। अमेरिकी कांग्रेसमैन राजा कृष्णमूर्ति ने हाल ही में सोशल मीडिया पर भारतीय-विरोधी, दक्षिण एशियाई-विरोधी और हिंदू-विरोधी नफरत बढ़ने पर चिंता जताई है।
कृष्णमूर्ति का आरोप है कि बड़ी टेक कंपनियां ऑनलाइन दुश्मनी से कमाई कर रही हैं। उन्होंने कांग्रेस से मांग की कि इन कंपनियों की जवाबदेही तय की जाए। उनका कहना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नफरत भरे कंटेंट पर ठीक से लगाम नहीं लगा रहे। उन्होंने दक्षिण एशियाई-विरोधी नफरत को बढ़ावा देने वाली पोस्ट में 240 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी का आंकड़ा भी दिया। X पर अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा, "Anti-Indian hate is exploding on social media, and Big Tech is profiting from it. These companies have no incentive to stop the hatred they help spread. Congress must hold them accountable."
नफरत या विरोध प्रदर्शनों को हवा देने में सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। यूरोप के कई देशों में फैली अशांति को और भड़काने के लिए भी इन प्लेटफॉर्म को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। पिछले कुछ हफ्तों में फ्रांस, स्पेन और अल्बानिया समेत कई देशों में युवाओं की अगुआई वाले ज्यादातर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के किनारे दंगे और हिंसा भड़क उठी।
फ्रांस के वित्त मंत्री रोलां लेस्क्यूर के हवाले से कहा गया है, "This societal question of the impact of social media on urban violence must be addressed, and there will probably be consequences. Social media, obviously, played a role." फ्रांस में प्रदर्शन की अपीलें Instagram, X और TikTok पर खूब घूमीं, जैसा हाई स्कूल के छात्रों के प्रदर्शन शुरू होने के बाद से ही होता आ रहा है।
माना जा रहा है कि इटली के मिलान और दूसरे शहरों में महंगाई और युवाओं के नाम पर हुए हालिया दंगों में भी लोगों को जुटाने और माहौल गरमाने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक वीकेंड पर नौजवानों को इटली के चौकों में बुलाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ।
स्पेन में हाल की नागरिक अशांति, प्रवासी-विरोधी प्रदर्शनों और राजनीतिक ध्रुवीकरण के पीछे सोशल मीडिया के जरिए चलाए गए गलत जानकारी के अभियान को वजह बताया जा रहा है। खबर है कि प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सख्त कार्रवाई का ऐलान किया है। उन्होंने आपराधिक गतिविधियों पर रोक, नाबालिगों की सुरक्षा और टेक कंपनियों की जवाबदेही तय करने वाले नियमों की घोषणा की। हाल में जारी एक वीडियो बयान में सांचेज ने इस पहल को डिजिटल प्लेटफॉर्म के "Wild West" जैसे माहौल का जरूरी जवाब बताया। उनका आरोप है कि ये प्लेटफॉर्म समाज को गंभीर नुकसान पहुंचाने में मदद करते हैं।
लेकिन सोशल मीडिया पर बेलगाम पाबंदी सही हल नहीं है, क्योंकि इससे असली आवाजें, खासकर स्वतंत्र पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाजें, दब जाएंगी। यूरोपियन फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने मीडिया फ्रीडम रैपिड रिस्पॉन्स, सेफ जर्नलिस्ट्स नेटवर्क, रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स, इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स, रिपोर्टिंग डाइवर्सिटी नेटवर्क और साउथ ईस्ट यूरोप मीडिया ऑर्गनाइजेशन के साथ मिलकर अल्बानिया की हालिया घटनाओं पर चिंता जताई है। वहां मीडिया, पत्रकारों, नागरिक पहलों और जनहित से जुड़े दूसरे अकाउंट पर बिना वजह बताए रोक, हटाए जाने और सोशल मीडिया के प्रवर्तन सिस्टम को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिशों के मामले सामने आए हैं।
पिछले कुछ दिनों में Meta के प्लेटफॉर्म पर कई अकाउंट पहुंच से बाहर हो गए या उन पर पाबंदी लग गई। बाद में Meta ने माना कि कुछ अकाउंट गलती से हटा दिए गए थे। कंपनी ने प्रभावित अकाउंट बहाल किए और संकेत दिया कि अतिरिक्त सुरक्षा इंतजाम लगाए जा रहे हैं। सुधार के ये कदम और प्रभावित मीडिया व नागरिक संगठनों से Meta की बातचीत स्वागत योग्य है।
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