सिर्फ शादी के लिए धर्म बदलना मंज़ूर नहीं, बॉम्बे हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि हर किसी को अपना धर्म बदलने की आज़ादी है, लेकिन सिर्फ शादी के लिए धर्मांतरण की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि सिर्फ शादी के लिए धर्म बदलने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि हर इंसान को अपना धर्म बदलने की आज़ादी है। महाराष्ट्र में हाल ही में लागू हुए धर्मांतरण विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह अहम टिप्पणी की।
यह सुनवाई चीफ जस्टिस महेश सी. त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की बेंच के सामने हुई। याचिका ठाणे के रहने वाले 70 साल के एक इस्लामी धर्मप्रचारक ने दाखल की है। बेंच ने कहा कि यह कानून समाज में धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने के लिए है और राज्य को ज़बरदस्ती या दबाव में होने वाले धर्मांतरण की चिंता है। शादी से ठीक एक दिन पहले धर्म बदलने की प्रथा पर भी कोर्ट ने सवाल उठाए।
बेंच ने कहा, "यह सिर्फ समाज की धर्मनिरपेक्ष बनावट को बनाए रखने के लिए है। सरकार का वास्ता सिर्फ ज़बरदस्ती या दबाव के धर्मांतरण से है। किसी को भी अपना धर्म बदलने की आज़ादी है। लेकिन सिर्फ शादी के लिए धर्मांतरण की इजाज़त नहीं दी जा सकती।"
महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य कानून, 2026 के तहत ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी, दबाव, प्रलोभन, गलत जानकारी, झूठा प्रभाव या शादी के ज़रिए कराया गया धर्मांतरण जुर्म माना गया है। कानून की धारा 6 के मुताबिक धर्म बदलने से पहले 60 दिन पहले प्रशासन को सूचना देना ज़रूरी है।
याचिका में आरोप है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिली धर्म के प्रचार की आज़ादी का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील युसूफ मुच्छला, मतीन शेख, एजाज मकबूल और शाहिद नदीम ने कानून की धारा 2(अ) में दी गई "आमिष" की परिभाषा को चुनौती दी। उन्होंने धारा 6 और 7 में तय धर्मांतरण से पहले की सख्त प्रक्रियाओं पर भी सवाल उठाए।
इस तरह एक तरफ कोर्ट ने हर व्यक्ति की धर्म बदलने की आज़ादी को बरकरार रखा, तो दूसरी तरफ साफ किया कि सिर्फ शादी की वजह से किया गया धर्मांतरण मंज़ूर नहीं होगा। कानून की वैधता पर याचिकाकर्ता की आपत्तियाँ अब भी कोर्ट के सामने हैं।
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