डिजिटल अरेस्ट पर बनी 'trAPPed' को पुलित्जर, सुपर्णा शर्मा और आनंद आरके को मिला सम्मान
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
भारत में डिजिटल अरेस्ट ठगी पर बनी चित्रों वाली इन्वेस्टिगेशन 'trAPPed' को 2026 का पुलित्जर पुरस्कार मिला है।
न्यूयॉर्क, अमेरिका, 30 अक्टूबर 2026: भारत की खोजी पत्रकार सुपर्णा शर्मा और इलस्ट्रेटर आनंद आरके को 2026 का पुलित्जर पुरस्कार मिला है। उनके साथ ब्लूमबर्ग की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर नेटली ओबिको पियर्सन भी इस सम्मान में शामिल हैं। यह पुरस्कार इलस्ट्रेटेड रिपोर्टिंग एंड कमेंट्री की श्रेणी में 'trAPPed' के लिए दिया गया, जो भारत में डिजिटल अरेस्ट ठगी पर चित्रों के सहारे की गई एक इन्वेस्टिगेशन है।
इस पुरस्कार का ऐलान 4 मई 2026 को हुआ था। टीम ने लखनऊ की एक न्यूरोलॉजिस्ट की कहानी सामने रखी है, जिन्हें पुलिस और दूसरे कानून लागू करने वाले अफसर बनकर बात करने वाले साइबर अपराधियों ने अपने जाल में फंसाया। उन्हें तथाकथित "डिजिटल अरेस्ट" में रखा गया। रिपोर्ट यह भी देखती है कि ठग धमकी, निगरानी और मानसिक दबाव के जरिए शिकार को सबसे अलग-थलग कर देते हैं और फिर उसके पैसों तक पहुंच बना लेते हैं।
'trAPPed' के केंद्र में न्यूरोलॉजिस्ट रुचिका टंडन का मामला है। उन्हें दूर से निगरानी में रखा गया और अथॉरिटी बनकर बैठे लोगों के निर्देश मानने के लिए दबाव डाला गया। अगस्त 2024 में आठ दिन तक उन पर निगरानी रखी गई। उन्हें परिवार से दूर रहने और कैमरे पर बने रहने का हुक्म दिया गया था। इस ठगी में परिवार की काफी बड़ी दौलत चली गई।
यह इन्वेस्टिगेशन सिर्फ पीड़ित के अनुभव तक सीमित नहीं रही। इसने ऐसे अपराधों के पीछे के बड़े नेटवर्क को भी खंगाला। शर्मा और पियर्सन की रिपोर्टिंग में काफी सफर, कई इंटरव्यू और पुलिस रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन व व्हाट्सऐप बातचीत की जांच शामिल रही। टीम ने म्यूल बैंक अकाउंट, क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज और शेल कंपनियों से जुड़े तार खोजे। इससे दिखता है कि डिजिटल अरेस्ट की ठगी अलग-अलग इक्का-दुक्का लोगों के बजाय संगठित नेटवर्क के जरिए भी चल सकती है।
टीम ने इस कहानी को चित्रों के जरिए कहने का फैसला इसलिए किया कि यह अपराध ज्यादातर फोन कॉल, स्क्रीन और मानसिक डराने-धमकाने के रास्ते हुआ। आनंद आरके की कलाकारी ने पीड़ित के अकेलेपन और ठगों की लगाई अदृश्य बंदिशों को दिखाया। साथ में चली इन्वेस्टिगेशन ने इस एक मामले को साइबर फ्रॉड और डिजिटल निगरानी की बड़ी समस्या के बीच रखकर समझाया।
इस पुरस्कार से यह भी साफ होता है कि पेचीदा इन्वेस्टिगेशन पाठकों को समझाने में विजुअल जर्नलिज्म की अहम भूमिका है। आनंद आरके का पूरा नाम आनंद राधाकृष्णन है। वे इससे पहले 2021 में ग्राफिक नॉवेल Blue in Green पर किए अपने काम के लिए आइजनर अवॉर्ड जीत चुके हैं।
पुरस्कार पाने वाला यह काम ब्लूमबर्ग ने 4 दिसंबर 2025 को छापा था। यह उसकी उस बड़ी इन्वेस्टिगेशन का हिस्सा था, जो बताती है कि भारत के डिजिटल विस्तार ने साइबर अपराधियों के लिए नए मौके कैसे खोले हैं, जहां वे टेक्नोलॉजी और सरकारी संस्थाओं पर लोगों के भरोसे का फायदा उठाते हैं। यह मामला दिखाता है कि ठग कानूनी अथॉरिटी का रूप धरकर पीड़ितों पर दबाव बनाते हैं और उनसे उनकी जमा-पूंजी निकलवा लेते हैं। इसी वजह से डिजिटल अरेस्ट ठगी आम लोगों के लिए गंभीर चिंता की बात बन गई है।
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