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रविवार, 8 नवंबर 2026

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अजित पवार के बिना पहली दिवाली: भाई राजेंद्र पवार ने बचपन के किस्से लिखे

अजित पवार के बिना पहली दिवाली: भाई राजेंद्र पवार ने बचपन के किस्से लिखे
अजित पवार | फाइल फोटो | Lokmat Times
कल्चर PT24 टीम

बारामती एग्रो के अध्यक्ष राजेंद्र पवार ने सोशल मीडिया पोस्ट में अजित पवार के साथ बिताई बचपन की दिवालियों को याद किया है।

बारामती: पवार परिवार के लिए इस साल की दिवाली पहले जैसी नहीं है। उपमुख्यमंत्री अजित पवार इसी जनवरी में दुनिया से चले गए थे। उनके अचानक जाने से पूरा महाराष्ट्र गम में डूब गया था। अब उनके बिना परिवार का पहला दिवाली आया है, और ऐसे में उनके चचेरे बड़े भाई राजेंद्र पवार का सोशल मीडिया पर लिखा एक भावुक संदेश लोगों के बीच खूब चर्चा में है। राजेंद्र पवार बारामती एग्रो के अध्यक्ष हैं और एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट ट्रस्ट के प्रमुख भी।

इस संदेश से पहले शरद पवार मीडिया में साफ कह चुके थे कि इस बार उनके घर दिवाली नहीं मनाई जाएगी। उनका कहना था कि अजित पवार के बिना यह त्योहार पहली बार आ रहा है, परिवार को गहरा दुख है और इसलिए इस साल जश्न नहीं होगा।

पवार परिवार की दिवाली महाराष्ट्र की राजनीति में हमेशा लोगों की नजर में रही है। हर साल बारामती के गोविंदबाग में दिवाली पाड़वा का आयोजन होता है, जहां शरद पवार से मिलने राज्य भर से कार्यकर्ता, पदाधिकारी और नेता पहुंचते हैं। अजित पवार के असमय चले जाने से इस बार यह सिलसिला टूटेगा।

राजेंद्र पवार ने अपनी पोस्ट के साथ एक पुराना वीडियो भी डाला है। पोस्ट अजित पवार को संबोधित है और उसमें साथ बिताए बचपन की दिवालियों की मीठी यादें हैं। उन्होंने लिखा, "अजित के जाने के बाद आज पहली बार दिवाली सूनी-सूनी लग रही है। बचपन से साथ मनाई गई दिवालियां बहुत अपनेपन की थीं। तासेब (अनंतराव) पटाखे लाते और सबको बराबर बांट देते थे। पटाखे दिन भर चलें, इसलिए हम उन्हें अंधेरी कोठरी में शेल्फ पर रखी बोरी में छिपा देते थे, ताकि किसी को मिल न जाएं।"

बच्चों की इस शरारत के और भी किस्से हैं। पैराशूट आसमान से उतरता तो उसके पीछे झाड़ियों और कांटों के बीच भागना पड़ता था। आधे जले पटाखों से बारूद निकालकर जमा की जाती और अगले दिन उसी से फिर आतिशबाजी होती थी। राजेंद्र पवार ने लिखा, "उस समय नया पैराशूट उड़ता तो उसे पकड़ने के लिए हम झाड़-झंखाड़ के बीच दौड़ते थे। आधे जले पटाखों की बारूद इकट्ठा करके अगले दिन जलाते थे। दादी के डर से हमारा पूरा घर सीधा चलता था। तू आज होता तो डर और प्यार कुछ और ही तरह का होता।"

पोस्ट में दादी के रौब का जिक्र है, तो दिवाली पर घर आने वाले एन. डी. पाटील का भी। उनके आते ही घर में बातों की रौनक लग जाती थी। राजेंद्र पवार के मुताबिक पाटील दूसरी पार्टी के थे और अपने उसूलों के पक्के थे, फिर भी हर उम्र के आदमी से उनकी बन जाती थी। उन्होंने लिखा, "पार्टी और अपने उसूल अलग रखकर रिश्ते निभाने चाहिए, यह मैंने सीखा।"

उस दौर की तंगी और सादगी को भी उन्होंने याद किया। उन्होंने लिखा, "उन दिनों इतने मेहमानों के लिए टोकरी वाला एक ही शौचालय था। बच्चों को टीन की आड़ के पीछे कतार में बैठना पड़ता, आगे-पीछे खिसकना पड़ता। इस अनुभव से आगे चलकर किसी के भी साथ निभाना हमारे लिए आसान हो गया।" घर के पीछे वाले कुएं से पानी भरने का नजारा भी उनकी यादों में है। उन्होंने लिखा, "घर के पीछे के कुएं से आधी आमराई पानी भरती थी और सुबह से कावड़ की चूं-चूं की आवाज़ चलती रहती थी। सीढ़ी पर बैठकर ईंट के टुकड़े से या राख से दांत मांजते हुए पिछली पीढ़ी ने हमें सिखाया कि हमारे पास जो कुछ है, उसमें समाज का भी हिस्सा होता है। घोंसले से गिरे चिड़ियों के बच्चे मिलते तो हम भटकती बकरी का दूध निकालकर उन्हें पिलाते थे।"

अजित पवार के पहनावे का किस्सा भी इसमें शामिल है। उनकी पसंद सबसे अलग थी और राजेश खन्ना जैसे कपड़े घर में बस उन्हीं के पास होते थे। राजेंद्र पवार ने लिखा, "तेरी कपड़ों की अलग पसंद की वजह से राजेश खन्ना स्टाइल के कपड़े सिर्फ तेरे पास ही थे। दिवालियां आती-जाती रहेंगी, पर बचपन में चुभे कांटों के निशान अब चुभकर अकेलापन देते रहेंगे।"

पोस्ट का आखिरी हिस्सा आज के हालात की तरफ मुड़ता है। राजेंद्र पवार खुद खेती करते हुए बारामती में ही रहे और उनके बच्चे भी यहीं पले। अजित पवार और उनके भाई-बहन मुंबई चले गए, जहां उनके बच्चे पैदा हुए, बड़े हुए और विदेश में पढ़े। इसी पर उन्होंने लिखा, "इन सारी अगली पीढ़ियों को हमारे बचपन की अपनेपन वाली दिवाली कैसे समझ आएगी? हमारे रिश्ते की पक्की बुनावट और ऋणानुबंध के नाज़ुक धागे वे कैसे समझेंगे? हर मौके पर याद करना ही अब पीछे रह गया है"। नीचे उन्होंने अपना नाम "राजुदादा" लिखा है।

कुल मिलाकर यह पोस्ट एक ऐसे परिवार की तस्वीर है जिसका साझा बचपन वक्त के साथ अलग-अलग शहरों और देशों में बिखर गया। दिवाली की रोशनी के बीच अजित पवार की कमी हर पंक्ति में महसूस होती है, और इसी वजह से लोग इसे बड़ी संवेदना के साथ पढ़ और साझा कर रहे हैं।

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