उल्वे के 19 फ्लैट खरीदारों को राहत, बिल्डर को 30 दिन में कब्जा देने का आदेश
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महाराष्ट्र रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल ने प्रथमेश कंस्ट्रक्शन से कहा है कि बकाया रकम मिलने के 30 दिन के भीतर फ्लैट खरीदारों को कब्जा सौंपे।
नवी मुंबई के उल्वे में 19 फ्लैट खरीदारों के लिए इस दिवाली एक उम्मीद लेकर आई है। जिन घरों के पैसे उन्होंने करीब दस साल पहले भरे थे, उनमें अब जाने का रास्ता खुलता दिख रहा है। महाराष्ट्र रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल ने M/s प्रथमेश कंस्ट्रक्शन को आदेश दिया है कि खरीदारों से बकाया रकम मिलने के 30 दिन के अंदर कब्जा दे दे।
4 नवंबर 2026 के आदेश में चेयरपर्सन जस्टिस एस एस शिंदे और सदस्य (ए) श्रीकांत एम देशपांडे की बेंच ने कब्जे की सभी 19 अर्जियां आंशिक रूप से मंजूर कर लीं। बेंच ने डेवलपर को इन फ्लैटों पर किसी तीसरे पक्ष का हक बनाने से भी रोक दिया है।
दूसरी तरफ प्रमोटर अजीत एस सिंह खरीदारों के दावों को नहीं मानते। उनका आरोप है कि कुछ खरीदारों ने फर्जी रसीदें लगाई हैं। उन्होंने कहा है कि वे इस आदेश को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती देंगे।
खरीदारों ने 2012 से 2015 के बीच बिक्री के करार किए थे और कब्जा दिसंबर 2016 तक देने का वादा था। काफी रकम भरने के बाद भी, और कुछ मामलों में पूरी कीमत चुकाने के बाद भी, उन्हें आठ से नौ साल की देरी झेलनी पड़ी।
विवाद तब उठा जब महारेरा ने 13 दिसंबर 2023 के रिव्यू आदेश में अपना 24 जनवरी 2022 का एकतरफा आदेश वापस ले लिया। उस आदेश में प्रमोटर को काम पूरा करने और देरी से कब्जे पर ब्याज देने को कहा गया था। इसके बाद खरीदार अपीलीय ट्रिब्यूनल पहुंचे।
प्रमोटर को इन फ्लैटों का ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट (OC) 1 दिसंबर 2023 को मिल गया था। ट्रिब्यूनल ने कहा कि RERA कानून की धारा 19(3) और 19(10) के तहत OC मिलने के बाद आवंटियों को कब्जे का हक है। दोनों पक्षों के बैंक स्टेटमेंट, रसीदें और हिसाब देखने के बाद ट्रिब्यूनल ने हर खरीदार की बकाया रकम तय कर दी।
आदेश के मुताबिक प्रमोटर को बकाया मिलने के 30 दिन में फ्लैट सौंपने होंगे। खरीदारों को भी बकाया कीमत और बिना विवाद वाले कब्जा शुल्क 30 दिन के अंदर भरने होंगे। दोनों पक्षों को 60 दिन में अनुपालन के हलफनामे दाखिल करने हैं। प्रमोटर न तो फ्लैटों पर तीसरे पक्ष का हक बना सकता है और न पुराने टर्मिनेशन नोटिस पर अमल कर सकता है। बकाया रकम, अतिरिक्त शुल्क और देरी के ब्याज के विवाद मुख्य अपीलों की सुनवाई में तय होंगे।
ज्यादातर खरीदारों की पैरवी करने वाले वकील अनिल डिसूजा ने इस अंतरिम राहत का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि आदेश से खरीदार कब्जे के और करीब पहुंचे हैं। हालांकि बड़े आर्थिक विवादों का फैसला अभी बाकी है।
अजीत एस सिंह ने कहा, "Project was ready in 2015. For reasons best known to these complainants, they never took possession even after I reminded them in 2016, 2019 and 2023. They are mere investors. I will consult my lawyers and challenge this order before Bombay HC soon." उनका आरोप है कि कुछ शिकायतकर्ताओं ने पूरी रकम नहीं चुकाई थी।
आरोपों पर डिसूजा ने कहा कि नकद भुगतान डेवलपर ने खुद मांगे थे और उनकी रसीदें भी दी थीं। उनके शब्दों में, "When he himself demanded the payments and issued receipts, how can he deny them? These are middle-class taxpayers who used their life's savings and complied with the builder's demands. Most of the payments had already been made, yet the allottees remained stuck. Even after obtaining the OC, he continued to withhold possession. The Tribunal has rightly issued a stern order directing him to hand over the flats."
BARC के रिटायर्ड साइंटिफिक असिस्टेंट सचिदानंद शेट्टी ने कहा, 'दस साल से ज्यादा की लड़ाई के बाद यह हमारे लिए सच्ची दिवाली है। मैंने 2012 में बुकिंग की थी और डिलीवरी 2016 में मिलनी थी। 2015 तक प्रोजेक्ट 90 प्रतिशत पूरा था, लेकिन डेवलपर के गलत कागजात की वजह से OC बार-बार अटकता रहा। डेवलपर ने हमारे फ्लैट गैरकानूनी तरीके से किराए पर भी दे दिए थे। मैं खारघर में किराए पर रहता हूं और 2021 से लोन की किस्त भर रहा हूं। हमें कब्जे का हक मिल गया है, बाकी तकनीकी मुद्दों पर हमारे वकील जल्द रिव्यू पिटीशन दाखिल करेंगे।'
NPCIL के रिटायर्ड साइंटिफिक ऑफिसर और प्रथमेश हार्मनी सीएचएस के सचिव एच एन लाल ने कहा, 'चाबी मिलने से पहले ही हमने उल्वे में प्रथमेश हार्मनी कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी बना ली थी। 2010 में 26 लाख रुपये में फ्लैट बुक किए थे, पर डेवलपर ने वह प्रोजेक्ट छोड़ दिया और हमें उल्वे में 55 लाख रुपये वाले महंगे विकल्प में भेज दिया। हममें से ज्यादातर सरकारी कर्मचारी हैं, हमने नकद हिस्से समेत पाई-पाई चुकाई। इस लड़ाई में तीन सदस्य चल बसे। हम जनवरी की आखिरी कानूनी लड़ाई के लिए तैयार हैं।'
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