2,000 रुपये के गांजा जुर्माने से गई सॉफ्टवेयर नौकरी, युवक पहुंचा हाईकोर्ट
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मुंबई के एक युवा डेटा साइंस प्रोफेशनल ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उसकी मांग है कि बोरीवली पुलिस स्टेशन के कन्विक्शन रजिस्टर से उसका नाम हटाया जाए। उसका कहना है कि कॉरपोरेट बैकग्राउंड चेक में यह सजा सामने आई और उसकी सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की नौकरी चली गई।
मामला गांजा पीने के आरोप में लगे 2,000 रुपये के जुर्माने का है। याचिका के मुताबिक 30 दिसंबर 2023 को यह युवक, जो उस वक्त 22 साल का था, बोरीवली वेस्ट के जनरल अरुण कुमार वैद्य मैदान में अपने चार दोस्तों के साथ था। तभी सादे कपड़ों में पुलिसवाले उसके पास आए। युवक का कहना था कि उसने कोई नशा नहीं किया था, फिर भी उसे बोरीवली पुलिस स्टेशन ले जाया गया, उसकी मेडिकल जांच हुई और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंसेज (NDPS) एक्ट की धारा 8(c) और धारा 27 के तहत मामला दर्ज हुआ।
5 मार्च 2024 को उसने बोरीवली की 26वीं मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में गुनाह कबूल कर लिया और उस पर 2,000 रुपये का जुर्माना लगा। उसके वकील एडवोकेट दिनेश डी तिवारी ने बताया कि रिश्तेदारों और वकील के समझाने पर युवक ने मामला जल्दी निपटाने के लिए गुनाह कबूल किया था। उसे नतीजों की पूरी समझ नहीं थी।
वकील के मुताबिक मार्च-अप्रैल 2025 में युवक को नवी मुंबई की एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी मिली। लेकिन अगले महीने बैकग्राउंड चेक में कथित तौर पर यह सजा सामने आई और उसे निकाल दिया गया। तिवारी ने बताया कि वह अब डेटा साइंस ट्रेनर के तौर पर काम करता है। उसके पास मैकेनिकल इंजीनियरिंग में BTech की डिग्री है और C-DAC से बिग डेटा एनालिटिक्स में पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा भी है।
आर्टिकल 226 के तहत दायर यह क्रिमिनल रिट याचिका दिनेश डी तिवारी एंड एसोसिएट्स के जरिए लगी है, जिसमें एडवोकेट पुलकेशी गायकवाड भी शामिल हैं। याचिका में बॉम्बे पुलिस मैनुअल, 1959 के चैप्टर III के रूल 70 के तहत नशे के छोटे मामलों में सजा दर्ज करने को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की दलील है कि ऐसी एंट्री से जिंदगी भर का दाग लग सकता है और सुधार की राह मुश्किल होती है। उसके वकील का कहना है कि कानून को नशे के छोटे सेवन और ड्रग तस्करी में फर्क करना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से तीन बातें मांगी हैं। पहली, रूल 70 की व्याख्या इस तरह की जाए कि वह NDPS एक्ट के तहत उन मामलों पर लागू न हो, जिन्हें वह मामूली उपभोक्ता अपराध बताता है। दूसरी, अधिकारियों को निर्देश मिले कि उसका नाम और ब्योरा बोरीवली पुलिस स्टेशन के कन्विक्शन रजिस्टर और उससे जुड़े आपराधिक रिकॉर्ड से हटाया जाए। तीसरी, वैकल्पिक तौर पर उसे प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 3 और 4 के तहत राहत दी जाए।
एडवोकेट दिनेश डी तिवारी का कहना है, "छोटे अपराध में बुक हुए लोगों के नाम पुलिस स्टेशन के कन्विक्शन रजिस्टर में दर्ज करना कानून की गलत व्याख्या है। दूसरी बात, NDPS एक्ट सुधार पर जोर देने वाला कानून है और धारा 64A में पहली बार पकड़े गए योग्य उपभोक्ताओं को रिहैबिलिटेशन का मौका मिलता है। इसलिए जिस व्यक्ति ने गलतफहमी में, फायदे-नुकसान समझे बिना खुद कोर्ट में गुनाह कबूल किया, वह राहत का हकदार है।"
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के पूर्व अधिकारी एडवोकेट प्रसन्नन नंबूदिरी ने कहा, "यह दुर्भाग्य की बात है कि एक नौजवान को सिर्फ इसलिए रोजगार के मौके गंवाने पड़े कि पुलिस रिकॉर्ड में उसका नाम सजायाफ्ता के तौर पर दर्ज था। NDPS एक्ट की धारा 27 के तहत अपराधी जुर्माना भरकर जेल से बच सकता है, लेकिन धारा 64A के तहत सबसे सही कानूनी रास्ता यह है कि वह खुद रिहैबिलिटेशन के लिए आगे आए और मुकदमे से छूट पाए। ऐसी हालत में फंसे हर व्यक्ति को अपने स्वैच्छिक नशामुक्ति के हक का इस्तेमाल करना चाहिए और रिहैबिलिटेशन करवाना चाहिए, न कि समरी ट्रायल में निपटारा करके करियर की लंबी रुकावटें झेलनी चाहिए।"
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