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23:25 IST

विसर्जन के बाद भी घर में रहेंगे बाप्पा, 'वृक्ष गजानन' मूर्ति की मिट्टी से उगेगा पौधा

पुणे के उरुळी कांचन में बनने वाली मिट्टी की ये मूर्तियां विसर्जन के बाद कुंडी में रोप लगाने के काम आती हैं, और अब देश-विदेश तक इनकी मांग पहुंच गई है।

विसर्जन के बाद भी घर में रहेंगे बाप्पा, 'वृक्ष गजानन' मूर्ति की मिट्टी से उगेगा पौधा
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

गणेशोत्सव नजदीक आते ही घर-घर में बाप्पा के स्वागत की तैयारी शुरू हो गई है। सजावट, आरास, नैवेद्य और मूर्ति की पसंद को लेकर लोग जुटे हैं, मगर इस बार कई लोग पर्यावरण के अनुकूल गणेशोत्सव मनाने के बारे में भी सोच रहे हैं। इसी सिलसिले में एक अलग तरह की सोच चर्चा में है, जो इस सवाल का जवाब देती है कि बाप्पा के विसर्जन के बाद आगे क्या। इस संकल्पना का नाम है 'वृक्ष गजानन', जिसमें विसर्जन के बाद मूर्ति की मिट्टी वापस एक कुंडी में डाली जाती है और उसी से पौधा उगाया जाता है, यानी बाप्पा नए रूप में घर में ही रह जाते हैं।

इस पहल की शुरुआत साल 2019 में डॉ. अक्षय कौठाळे, केदार कुंभार, ऋत्वेश जाधव और चारुदत्त जाधव ने की थी, जिनके मन में प्रकृति के प्रति प्रेम और पर्यावरण की चिंता से यह आइडिया आया। पुणे के उरुळी कांचन इलाके के दत्तवाडी में ये मूर्तियां तैयार होती हैं। शुरुआत में सिर्फ 11 इंच की एक ही मूर्ति बनाई गई थी, बाद में अलग-अलग आकार और डिजाइन के कई मॉडल तैयार किए गए।

पुणे से शुरू हुआ यह सफर अब महाराष्ट्र की सीमा पार कर चुका है। नाशिक, अमरावती, जळगाव और धुळे में बिक्री केंद्र और डिस्ट्रीब्यूटर्स का नेटवर्क खड़ा हो गया है। इतना ही नहीं, दुबई, कनाडा, जर्मनी और अमेरिका तक भी ये मूर्तियां भेजी जा रही हैं, जबकि बेंगलुरु, हैदराबाद, कारवार और बेळगाव से ऑनलाइन ऑर्डर आ रहे हैं।

इन मूर्तियों की खास बात यह है कि इन्हें खेत की काली मिट्टी से बनाया जाता है और मिट्टी के अलावा कोई भी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता। मजबूती के लिए सिर्फ नारियल की जटा का इस्तेमाल किया जाता है। हर मूर्ति के साथ एक जूट का थैला, मिट्टी की कुंडी और बीज का पैकेट भी दिया जाता है। इस बार पैकेट में बैंगन और मेथी के बीज शामिल हैं, ताकि विसर्जन के बाद मूर्ति की मिट्टी कुंडी में डालकर उसमें बीज बोए जा सकें और उससे हरा-भरा पौधा उग सके।

इस काम में महिलाओं की भी बड़ी भागीदारी है। उरुळी कांचन के कारखाने में महिलाएं मूर्ति बनाने के साथ-साथ मुकुट की नक्काशी, आंखें और तिलक बनाने का काम भी करती हैं। कारोबार बढ़ने के साथ हर साल सात से आठ महिलाओं को रोजगार मिल रहा है।

शाडू की मूर्तियों के मुकाबले इन्हें बनाने में ज्यादा वक्त और मेहनत लगती है, फिर भी आम लोगों तक यह पर्यावरण के अनुकूल विकल्प पहुंचे, इसके लिए एक फुट की मूर्ति की कीमत शाडू की मूर्ति के आसपास ही रखी गई है। नदी में विसर्जन कर उत्सव खत्म करने के बजाय, विसर्जन के बाद भी बाप्पा को नए रूप में संभालने का संदेश 'वृक्ष गजानन' के जरिए दिया जा रहा है।

पैकेज में गणेश मूर्ति के साथ चांदी जैसा पाट, मिट्टी से भरी कुंडी, बीज का पैकेट और जूट का थैला दिया जाता है। इस पहल के फायदे भी गिनाए जा रहे हैं, जैसे मूर्ति पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल होना, घर पर ही विसर्जन की सुविधा मिलना, पानी के प्रदूषण पर रोक लगने में मदद, विसर्जन के बाद मिट्टी का दोबारा इस्तेमाल, बाप्पा की मिट्टी से पौधा उगाने का मौका, पेड़ लगाने की सोच को बढ़ावा, प्लास्टिक की जगह जूट के थैले का इस्तेमाल और साथ ही महिलाओं को रोजगार का मौका मिलना।

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