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17:46 IST

वसंत पुरुषोत्तम साठे की जन्मशताब्दी पर स्मृति ग्रंथ "वसंत स्मृति" प्रकाशित

लोकनेता वसंत पुरुषोत्तम साठे (1925-2025) की जन्मशताब्दी पर उनके सार्वजनिक जीवन, संसदीय योगदान और विदर्भ से जुड़ाव को समर्पित स्मृति ग्रंथ जारी।

वसंत पुरुषोत्तम साठे की जन्मशताब्दी पर स्मृति ग्रंथ "वसंत स्मृति" प्रकाशित
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

लोकनेता वसंत पुरुषोत्तम साठे की जन्मशताब्दी के मौके पर एक स्मृति ग्रंथ तैयार किया गया है, जिसका नाम "वसंत स्मृति" रखा गया है। इस ग्रंथ में उनके सार्वजनिक जीवन, संसदीय योगदान, बौद्धिक सोच, सांस्कृतिक रुचियों, प्रशासनिक नेतृत्व और विदर्भ व नागपुर से उनके लंबे जुड़ाव को याद किया गया है।

इस किताब में उन लोगों के संस्मरण, श्रद्धांजलियां, विचार और संदेश शामिल किए गए हैं जो साठे को जानते थे, उनके साथ काम कर चुके थे या उनसे प्रेरित हुए थे। इनमें प्रमुख सार्वजनिक हस्तियां, न्यायविद, सांसद, प्रशासक, शिक्षाविद, पत्रकार और सामाजिक नेता शामिल हैं। किताब का मुख्य मकसद एक ऐसे दूरदर्शी, प्रगतिशील, बौद्धिक रूप से स्वतंत्र और जनता से जुड़े नेता को याद करना है, जिनका सार्वजनिक जीवन लोकतांत्रिक मूल्यों, राष्ट्रीय विकास, सामाजिक सरोकारों, सांस्कृतिक कूटनीति और जनसेवा से जुड़ा रहा।

वसंत पुरुषोत्तम साठे का जन्म 5 मार्च 1925 को नाशिक, महाराष्ट्र में हुआ था। उनका निधन 23 सितंबर 2011 को हुआ। उन्होंने भोंसला मिलिट्री स्कूल नाशिक, नागपुर महाविद्यालय और मॉरिस कॉलेज, नागपुर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र और कानून की पढ़ाई की। महज 17 साल की उम्र में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई थी।

साठे 1972 से 1991 तक लोकसभा के सदस्य रहे, पहले अकोला और बाद में वर्धा सीट से। केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्होंने सूचना व प्रसारण, रसायन व उर्वरक, इस्पात, खान व कोयला, और ऊर्जा व संचार जैसे कई अहम मंत्रालय संभाले। सूचना व प्रसारण मंत्री रहते हुए 1982 के एशियाई खेलों के आसपास भारत में रंगीन टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत से वे सीधे जुड़े रहे। इसके अलावा वे इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस (आईसीसीआर) के अध्यक्ष भी रहे और यूनेस्को समेत कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। विदर्भ की कई सामाजिक, सांस्कृतिक, खेल और विकास से जुड़ी संस्थाओं से भी उनका नाता रहा।

एक विचारक और लेखक के तौर पर भी साठे ने अपनी छाप छोड़ी। उन्होंने "टुवर्ड्स सोशल रिवॉल्यूशन", "नेशनल गवर्नमेंट: एजेंडा फॉर अ न्यू इंडिया" और "मेमॉयर्स ऑफ अ रैशनलिस्ट" जैसी किताबें लिखीं। उनका सार्वजनिक जीवन बेबाक बयानों, बौद्धिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक कूटनीति और बड़े राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़ाव के लिए याद किया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने शोक संदेश में साठे की बुद्धिमत्ता और सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान को याद किया था।

इस स्मृति ग्रंथ के लिए जिन प्रमुख हस्तियों ने संदेश भेजे, उनमें नितिन गडकरी, देवेंद्र फडणवीस, शरद ए. बोबडे, भूषण आर. गवई, बनवारीलाल पुरोहित और डॉ. विजय दर्डा शामिल हैं। किताब में योगदान देने वालों में प्रभाकर डुपारे, डॉ. उदय बोधनकर, सुनीति बोधनकर, सुमित्रा महाजन, पद्मभूषण डॉ. रामचंद्र दत्तात्रय लेले, पद्मभूषण डॉ. एम. खलीलुल्लाह, न्यायमूर्ति विकास सिरपुरकर, न्यायमूर्ति किशोर रोही, कुमार केतकर, प्रो. जोगेंद्र कवाड़े, डॉ. वेदप्रकाश मिश्रा, डॉ. दीपक टेंपे, एडवोकेट श्रीहरि अणे, शौकत कुरैशी, एस. वी. जामा, उल्हास पवार, डॉ. गिरीश गांधी, सुधीर गाडगीळ, एस. एन. विनोद, प्रकाश दुबे, श्रीपाद अपराजित, श्रीकृष्ण चांडक, प्रदीप दाते, डॉ. श्रीकांत चोरागडे, स्वर्गीय प्रभाकर पाठक, एडवोकेट आसिफ कुरैशी और नरेंद्र गजभिये के नाम शामिल हैं।

ग्रंथ की संपादकीय व प्रकाशन टीम में प्रभाकर डुपारे मुख्य संपादकीय प्रभार में रहे, डॉ. उदय बोधनकर संपादक और सुनीति बोधनकर सह-संपादक रहीं। समीक्षा का जिम्मा डॉ. श्रीकांत चोरागडे ने संभाला। छपाई मोनल मालजी ने और प्रकाशन मकरंद कुलकर्णी ने किया।

"वसंत स्मृति" सिर्फ एक शताब्दी स्मारिका भर नहीं है, बल्कि यह एक असाधारण सार्वजनिक शख्सियत की सामूहिक याद है। तमाम आवाजों और निजी यादों के जरिए इसमें वसंत साठे को एक राष्ट्रीय राजनेता, प्रगतिशील विचारक, सांसद, प्रशासक, सांस्कृतिक दूत, विदर्भ के नेता और प्रेरणादायक इंसान के रूप में पेश किया गया है। इस ग्रंथ का मकसद उनके विचारों, आदर्शों, जनसेवा और विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजना है, खासकर उन युवाओं के लिए जो सार्वजनिक जीवन के प्रति उनके समर्पण से प्रेरणा ले सकते हैं।

किताब का केंद्रीय संदेश है: "राष्ट्र प्रथम, समाज सर्वोपरि और मानवता ही सर्वोच्च मूल्य" यानी राष्ट्र सबसे पहले, समाज सर्वोपरि और मानवता सर्वोच्च मूल्य।

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