वर्धा: बारहमाही सिंचित जमीन पर दोगुना मुआवजा, हाई कोर्ट का चिचटे परिवार के हक में फैसला
वर्धा जिले के कोलोना गांव में नहर के लिए ली गई जमीन का मुआवजा बॉम्बे हाई कोर्ट ने बढ़ाया।
खेत में पक्का कुआं हो, बाग लगा हो और सालभर फसल लेने की सुविधा हो, तो उस जमीन को महज बंजर मानकर कम मुआवजा दे देना ठीक नहीं है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि ऐसे ठोस सबूत मिलने पर जमीन को बारहमाही सिंचित ही माना जाएगा, और नियम के मुताबिक सूखी जमीन के मुकाबले दोगुनी दर से मुआवजा देना होगा।
इस फैसले से वर्धा जिले की देवली तहसील के कोलोना गांव में रहने वाले चिचटे परिवार को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उनकी अधिग्रहित जमीन के लिए कुल 5.04 लाख रुपये मुआवजा तय कर दिया है। परिवार को पहले 2.46 लाख रुपये मिल चुके थे, वह रकम घटाकर अब 1.68 लाख रुपये अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। इसके अलावा कानून के तहत जो भी वैधानिक लाभ बनते हैं, वे भी देने को कहा गया है।
मामला वर्धा जिले की देवली तहसील के मौजा कोलोना का है। चिचटे परिवार की सर्वे नंबर 175 में कुल 3.90 हेक्टेयर खेती की जमीन थी। लोअर वर्धा परियोजना के तहत कोलोना नहर बनाने के लिए इसमें से 0.58 हेक्टेयर जमीन 25 नवंबर 2010 को अधिग्रहित की गई थी। उस समय भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने इस जमीन के लिए सिर्फ 89,900 रुपये मुआवजा मंजूर किया था।
किसान परिवार को यह रकम बहुत कम लगी। जमीन की असली हालत और उस पर मौजूद सिंचाई सुविधाओं का हवाला देकर उन्होंने ज्यादा मुआवजे की मांग की और वर्धा के दिवानी न्यायालय में बने रेफरेंस कोर्ट में गुहार लगाई। रेफरेंस कोर्ट ने किसानों की बात आंशिक रूप से मानते हुए मुआवजा बढ़ाकर 2.46 लाख रुपये कर दिया था, लेकिन चिचटे परिवार इससे भी संतुष्ट नहीं था और मामला आगे बढ़ा।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने केस से जुड़े सबूतों और लागू नियमों की जांच करने के बाद कहा कि जमीन की असली सिंचाई क्षमता को नजरअंदाज करके सिर्फ सूखी जमीन के आधार पर मुआवजा तय करना गलत है। कोर्ट के मुताबिक बारहमाही सिंचित जमीन की खेती से होने वाली पैदावार और उसकी आर्थिक कीमत सूखी जमीन से ज्यादा होती है, इसलिए नियमों के हिसाब से ऐसी जमीन के लिए सूखी जमीन के मुकाबले दोगुना मुआवजा तय किया जाना चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने चिचटे परिवार के हक में यह आदेश दिया है।