वराह अवतार: भगवान विष्णु को सुअर का रूप क्यों लेना पड़ा, नाक पर धरती उठाने की कहानी
वराह जयंती के मौके पर जानिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार क्यों लिया और पृथ्वी को कैसे बचाया।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के दस अवतारों का खास महत्व माना जाता है। इन्हीं में से एक है वराह अवतार, जिसमें भगवान विष्णु ने धरती को संकट से बचाने के लिए सुअर यानी वराह का रूप धारण किया था। वराह जयंती हर साल भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के वराह रूप की पूजा करने और व्रत रखने की परंपरा चली आ रही है।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक वराह जयंती के दिन भगवान विष्णु के इस रूप की पूजा करने से पाप धुल जाते हैं और जिंदगी की परेशानियों से छुटकारा मिलता है। यह भी माना जाता है कि जिन लोगों को जमीन या घर चाहिए, वे भगवान वराह को समर्पित खास विधि और मंत्रों का जाप कर सकते हैं। इस पूजा के लिए दोपहर का वक्त सबसे शुभ बताया जाता है।
इस बार वराह जयंती रविवार, 13 सितंबर को है। पंचांग के हिसाब से तृतीया तिथि 13 सितंबर की सुबह 7:08 बजे शुरू होकर 14 सितंबर की सुबह 7:08 बजे तक रहेगी। भगवान वराह की पूजा के लिए दोपहर का समय सबसे उत्तम माना जाता है, और इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 1:23 बजे से 3:51 बजे तक रहेगा। यानी पूजा के लिए कुल 2 घंटे 28 मिनट मिलेंगे।
कहानी के अनुसार सतयुग में हिरण्याक्ष नाम के राक्षस ने अपनी ताकत दिखाते हुए धरती को समुद्र में डुबो दिया और उसे पाताल लोक की तरफ खींच लिया। धरती के समुद्र में डूब जाने से पूरी सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा और सभी जीवों पर संकट आ गया। ऐसे वक्त में धरती की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वराह का रूप लिया।
ऐसी मान्यता है कि जब धरती को बचाने का कोई और रास्ता नहीं बचा था, तब भगवान विष्णु ब्रह्मा जी की नाक से वराह रूप में प्रकट हुए। उनका शरीर तुरंत विशाल हो गया। भगवान वराह ने समुद्र में उतरकर उसकी गहराई में जाकर धरती को खोज निकाला। समुद्र से धरती को बाहर निकालने से पहले भगवान वराह का सामना ताकतवर राक्षस हिरण्याक्ष से हुआ, जिनके बीच जबरदस्त युद्ध हुआ। आखिर में भगवान विष्णु ने वराह रूप में हिरण्याक्ष का वध किया और धरती को उसकी पकड़ से आजाद कराया।
कहानी बताती है कि धरती को खोजकर वापस लाने के लिए पानी के अंदर डुबकी लगाने वास्ते वराह का रूप सबसे सही था, इसीलिए भगवान विष्णु ने यह रूप चुना। वराह की मजबूत दाढ़ों और नाक की मदद से भगवान समुद्र की तलहटी तक पहुंचे, पृथ्वी देवी को ऊपर उठाया और उन्हें सुरक्षित जगह पर लाए। यही वजह है कि वराह अवतार में भगवान विष्णु को धरती को अपनी दाढ़ या नाक पर उठाए हुए दिखाया जाता है। इसके पीछे मकसद धरती और सृष्टि की रक्षा करना ही माना जाता है।
पूजा की विधि की बात करें तो सुबह जल्दी उठकर नहाना और साफ कपड़े पहनना चाहिए, फिर उपवास या पूजा का संकल्प लेना चाहिए। एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान वराह या भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखनी चाहिए। भगवान को तुलसी के पत्ते, चंदन, अक्षत, धूप, दीया और लाल फूल या कमल चढ़ाया जाता है। इसके बाद पंचामृत, फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है। वराह अवतार की कथा सुनी जाती है और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या "ॐ वराहाय नमः" मंत्र का जाप किया जाता है। आखिर में घी का दीया जलाकर, हुई गलतियों के लिए माफी मांगते हुए आरती की जाती है।