सूखे की मार: चारा-पशुखाद्य महंगे, दूध उत्पादकों के लिए खरीद दर बढ़ाने की मांग
सातारा जिले में बारिश न होने से खेती चौपट है और दूध का धंधा भी घाटे में जा रहा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने कलेक्टर को निवेदन देकर तुरंत राहत मांगी है।
सातारा जिले में बारिश न होने की वजह से खेती का पूरा हिसाब-किताब बिगड़ गया है। इसी बीच किसानों का जोड़ धंधा यानी दूध का कारोबार भी आर्थिक संकट में फंस गया है। चारा, पशुखाद्य, दवाइयां, मजदूरी और जानवरों को पालने का खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन दूध बेचकर मिलने वाली कमाई उस हिसाब से नहीं बढ़ी।
सूखे की वजह से किसान पहले ही परेशानी में थे। अब उनके सामने जानवर पालने का खर्च निकालने की भी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। इसी को देखते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने मांग की है कि दूध उत्पादकों को तुरंत राहत देने के लिए दूध की खरीद दर बढ़ाई जाए। पार्टी ने यह भी कहा कि सूखा पीड़ितों के लिए जो सहूलियतें घोषित हुई हैं, वे सीधे किसानों तक पहुंचें।
सातारा जिले के कई इलाकों में पानी और चारे की किल्लत महसूस की जा रही है। खेती से उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हो रही, इसलिए कई किसान कमाई के सहारे के तौर पर पशुपालन की तरफ देख रहे थे। मगर जानवरों के लिए काफी चारा न मिलना, पशुखाद्य के बढ़ते दाम और इलाज का खर्च, इन सबने दूध के धंधे का गणित भी बिगाड़ दिया है। जो धंधा खेती को सहारा देता था, वही अब किसानों के लिए आर्थिक बोझ बनता दिख रहा है।
पशुखाद्य के बढ़ते दाम, चारे की कमी, दवा-इलाज और मजदूरी की वजह से एक लिटर दूध पैदा करने का खर्च बढ़ रहा है। दूसरी तरफ दूध की खरीद दर काफी नहीं है। ऐसे में दूध उत्पादक के हाथ में असल में कितनी कमाई बचती है, यह सवाल खड़ा हो गया है। इसीलिए मांग की गई है कि उत्पादकों की खरीद दर में तुरंत बढ़ोतरी करके उन्हें आर्थिक राहत दी जाए।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के जिलाध्यक्ष बाळासाहेब पाटील की अगुवाई में कलेक्टर को निवेदन दिया गया। पार्टी ने साफ कहा कि सूखा घोषित होने के बाद सरकार ने जो सहूलियतें और मदद घोषित की है, वह सिर्फ कागज पर न रहे। वह सीधे किसानों के खेत की मेड़ तक पहुंचना जरूरी है।
निवेदन में मांग की गई कि चारा, पानी, आर्थिक मदद और बाकी सूखा राहत की सहूलियतें पात्र लाभार्थियों तक तुरंत पहुंचाई जाएं। साथ ही आशंका जताई गई कि सूखे की तीव्रता बढ़ने से पहले अगर प्रशासन ने ठोस उपाय नहीं किए, तो खेती के साथ पशुपालन पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।