सातारा के 11 साल के राघव मोरे ने दो दिन में चढ़े कलावंतीण और प्रबळगड
सातारा के 11 साल के राघव किरण मोरे ने दो दिन की मुहिम में कलावंतीण दुर्ग और प्रबळगड दोनों के शिखर सर किए।
सातारा के 11 साल के राघव किरण मोरे ने साबित कर दिया कि हिम्मत, लगन और ट्रेकिंग का शौक हो तो उम्र आड़े नहीं आती। राघव ने दो दिन की मुहिम में सह्याद्रि के मुश्किल माने जाने वाले कलावंतीण दुर्ग और ऐतिहासिक प्रबळगड, दोनों के शिखर सर किए। सातारा के इस छोटे बच्चे की इस मुहिम की तारीफ हो रही है।
मुहिम शुक्रवार को पहले दिन दोपहर 12 बजे पहाड़ के नीचे से शुरू हुई। दोपहर 2.30 बजे राघव और उसके साथी प्रबळमाची पहुंचे। खाना खाने के बाद आगे की चढ़ाई शुरू हुई। करीब आधे घंटे की चढ़ाई के बाद कलावंतीण दुर्ग की खड़ी और मुश्किल सीढ़ियां शुरू हुईं। राघव ने ये कठिन सीढ़ियां सिर्फ 20 मिनट में पार कर कलावंतीण दुर्ग का शिखर छू लिया। इसके बाद रात करीब साढ़े सात बजे दुर्ग से सुरक्षित उतराई की गई।
शनिवार को दूसरे दिन सुबह 6.30 बजे प्रबळगड की चढ़ाई शुरू हुई। सिर्फ दो घंटे में, सुबह 8.30 बजे, राघव प्रबळगड के ऊपर पहुंच गया। खड़ी चढ़ाई, अवघड सीढ़ियां और रात की उतराई जैसी कई चुनौतियों के बीच राघव का आत्मविश्वास और हौसला बना रहा।
इस मुहिम में दुर्गनाद ट्रेकर्स के संस्थापक गणेश शिंदे और दुर्गनाद ट्रेकर्स की कोल्हापुर व सातारा टीम का मार्गदर्शन और सहयोग मिला। राघव के माता-पिता ने भी उसकी शारीरिक तैयारी के साथ मुहिम की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा।
कलावंतीण दुर्ग दो हिस्सों में बंटा है, प्रबळमाची और कलावंतीण का सुळका। प्रबळ माची पर आदिवासी भाइयों की बस्ती है। रास्ता चौड़ा और फिसलन भरा है। आगे पत्थर में तराशी गई, 80 अंश के कोण पर शिखर तक पहुंचने वाली एक से डेढ़ फुट ऊंची सीढ़ियां हैं। कलावंतीण के सुळके के नीचे एक गुफा है, जिसका प्रवेश द्वार छोटा है।
सीढ़ियों का आखिरी हिस्सा पार करने पर कलावंतीण का आखिरी 25 फुट का रॉकपैच आता है, जो पिनॅकल वाला हिस्सा है। काली चट्टानों का यह रॉकपैच आसपास के कई दुर्गों और उनके नीचे के इलाकों पर नजर रखने के लिए बना एक कुदरती बुर्ज कहा जा सकता है। इस रॉकपैच पर रस्सी की मदद से चढ़कर कलावंतीण सर किया जा सकता है।
राघव आण्णासाहेब कल्याणी स्कूल का स्टूडेंट है और अभी छठी क्लास में पढ़ता है। उसकी इस हिम्मत भरी मुहिम की हर तरफ तारीफ हो रही है और बच्चों में गढ़-किलों के बारे में प्रेरणा जगा रही है।
छोटी उम्र से गढ़-किलों और कुदरत का शौक रखने वाले राघव का यह हौसला खास तारीफ के लायक रहा। सिर्फ 11 साल की उम्र में कलावंतीण दुर्ग और प्रबळगड सर कर उसने बाल गिर्यारोहकों के सामने नई मिसाल रखी है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक सह्याद्रि का यह मुश्किल गढ़ चढ़ने वाला वह पहला छोटा बच्चा है।