गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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00:04 IST

सरकारी अस्पतालों में ओपीडी तीन गुना बढ़ी, डॉक्टर-स्टाफ उतनी रफ्तार से नहीं बढ़े

महाराष्ट्र के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन डॉक्टर, स्टाफ और खाटों की संख्या उसी रफ्तार से नहीं बढ़ी, ऐसा सवाल पूर्व आरोग्य महासंचालक डॉ. सुभाष साळुंखे ने उठाया है।

सरकारी अस्पतालों में ओपीडी तीन गुना बढ़ी, डॉक्टर-स्टाफ उतनी रफ्तार से नहीं बढ़े तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

राज्य के सरकारी अस्पतालों में बाहरी मरीजों यानी ओपीडी की संख्या तेजी से बढ़ रही है, मगर आरोग्य सेवा का विस्तार उसी रफ्तार से हुआ या नहीं, यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है। ओपीडी का तिप्पट बढ़ना एक तरफ यह दिखाता है कि लोगों का सरकारी आरोग्य व्यवस्था पर भरोसा बढ़ा है, लेकिन दूसरी तरफ इससे डॉक्टर, नर्स, बाकी आरोग्य स्टाफ, खाटों और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पड़ने वाला दबाव भी साफ दिखता है।

सार्वजनिक आरोग्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में आरोग्य सेवा संचालनालय के अंतर्गत जिला अस्पताल, संदर्भ सेवा अस्पताल, सामान्य अस्पताल, स्त्री अस्पताल, उपजिला अस्पताल, ग्रामीण अस्पताल और ट्रॉमा केअर सेंटर मिलाकर कुल 611 अस्पताल और सेंटर हैं, जिनमें कुल 29 हजार 534 खाटें उपलब्ध हैं।

मरीजों की तादाद बढ़ने के साथ दवाइयों की सप्लाई, लैब जांच, एक्स-रे और बाकी डायग्नोसिस सुविधाएं तथा खाटों की क्षमता भी उसी हिसाब से बढ़ानी जरूरी है। पूर्व आरोग्य महासंचालक डॉ. सुभाष साळुंखे का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में ओपीडी बढ़ने को सिर्फ आरोग्य सेवा की उपलब्धता बढ़ने का संकेत मानकर नहीं चला जा सकता। उनके मुताबिक बढ़ते मरीजभार से निपटने के लिए जरूरी डॉक्टर, मनुष्यबल, खाटें और उपचार क्षमता कितनी बढ़ी, इसका जायजा लेने का वक्त आ गया है।

आंकड़ों के हिसाब से 20 जिला अस्पतालों में 5 हजार 127 खाटें, 24 स्त्री अस्पतालों में 3 हजार 5 खाटें, 33 सौ खाटों वाले उपजिला अस्पतालों में 3 हजार 300 खाटें और 73 पचास खाटों वाले उपजिला अस्पतालों में 3 हजार 650 खाटें हैं। राज्य के 373 ग्रामीण अस्पतालों में 11 हजार 190 खाटें हैं, वहीं 78 ट्रॉमा केअर सेंटर में 1 हजार 560 खाटों की व्यवस्था है।

खास बात यह है कि ग्रामीण इलाकों के मरीजों को बड़े शहरों की तरफ भागना न पड़े, इसके लिए 30 खाटों वाले ग्रामीण अस्पतालों का दर्जा बढ़ाकर 106 उपजिला अस्पताल बनाए गए हैं। इन अस्पतालों में रेफर किए गए मरीजों का इलाज और अलग-अलग सर्जरी होती हैं। लेकिन जब ओपीडी का मरीजभार तीन गुना बढ़ चुका है, तब सवाल यह है कि उसी अनुपात में डॉक्टर, सर्जन, स्त्रीरोगतज्ज्ञ, बालरोगतज्ज्ञ, नर्स और तकनीकी स्टाफ की संख्या भी बढ़ी या नहीं।

डॉ. सुभाष साळुंखे के मुताबिक आबादी के हिसाब से खाटों की संख्या और आरोग्य मनुष्यबल की संस्थाएं बढ़ाने के साथ-साथ आरोग्य योजनाओं में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को भी और बड़े पैमाने पर सुनिश्चित करना जरूरी है। उनका कहना है कि सार्वजनिक आरोग्य व्यवस्था की तरक्की सिर्फ ओपीडी बढ़ने से नहीं मापी जा सकती; इसके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर, मनुष्यबल और उपचार क्षमता का संतुलन बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।

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