मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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20:05 IST

राष्ट्रीय महिला आयोग की सिफारिश: 730 दिन की चाइल्ड केयर लीव माँ और पिता में बराबर बँटे

राष्ट्रीय महिला आयोग ने केंद्र सरकार को 37 सिफारिशें भेजी हैं। इनमें चाइल्ड केयर लीव को लिंग-निरपेक्ष करने और पिता को भी पगार के साथ छुट्टी देने की बात है।

राष्ट्रीय महिला आयोग की सिफारिश: 730 दिन की चाइल्ड केयर लीव माँ और पिता में बराबर बँटे
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

राष्ट्रीय महिला आयोग ने बच्चों की देखभाल के लिए मिलने वाली छुट्टी को लेकर एक अहम सिफारिश की है। आयोग ने केंद्र सरकार को कुल 37 सिफारिशें सौंपी हैं। इनमें कहा गया है कि प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए चाइल्ड केयर लीव सिर्फ महिलाओं तक सीमित न रहे, बल्कि उसे 'लिंग-निरपेक्ष' बनाया जाए।

आयोग का सुझाव है कि यह छुट्टी दोनों पालकों पर बराबरी से लागू हो। यानी 730 दिन की सवेतन छुट्टी (पेड लीव) बच्चे की माँ और उसके पिता के बीच बराबर बाँटी जा सकती है। ये सिफारिशें महिला व बाल विकास मंत्रालय और श्रम व रोजगार मंत्रालय को भेजी गई हैं। उनमें आयोग ने इस बात पर जोर दिया है कि बच्चे का माँ और पिता, दोनों से भावनात्मक रिश्ता बराबर अहमियत रखता है।

आयोग ने पालनाघर यानी क्रेच को लेकर भी सिफारिश की है। उसके मुताबिक सरकार को 2030 तक क्रेच में 5 लाख नई जगहें उपलब्ध करानी चाहिए।

पितृत्व अवकाश को मूलभूत अधिकार मानने की सिफारिश भी की गई है। बच्चों की परवरिश में पिता की भूमिका को सामने रखते हुए आयोग ने प्राइवेट और असंगठित, दोनों क्षेत्रों में अनिवार्य और पगार के साथ पितृत्व अवकाश लागू करने को कहा है। आयोग ने कहा कि यह मूलभूत अधिकार के तौर पर दिया जाना चाहिए।

आयोग का यह भी कहना है कि इस पहल की शुरुआत लघु उद्योगों से हो और 'बाल संगोपन अवकाश' को 'सामाजिक सुरक्षा संहिता' में शामिल किया जाए। बच्चों से जुड़ी इन नीतियों को अपनाने वाली कंपनियों को टैक्स में छूट और आर्थिक मदद दी जा सकती है।

स्तनपान के लिए मिलने वाले समय पर भी आयोग ने सिफारिश की है। उसने बताया कि अभी कामकाजी महिलाओं को दफ्तर या काम की जगह पर स्तनपान के लिए सिर्फ 15 मिनट मिलते हैं। आयोग चाहता है कि यह समय बढ़ाकर 30 मिनट किया जाए। साथ ही स्तनपान के लिए अलग कक्ष बनाना अनिवार्य हो और इससे जुड़े नियमों पर सख्ती से अमल हो।

फिलहाल चाइल्ड केयर लीव सिर्फ दो बच्चों के लिए लागू है। आयोग ने इस सीमा पर दोबारा विचार करने की अपील की है और सुझाव दिया है कि चरणबद्ध तरीके से तीसरे बच्चे को भी इसमें शामिल किया जाए।

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