पुरंदर हवाई अड्डा भूमि अधिग्रहण: ९१० हेक्टर जमीन ली गई, ३,८७५ करोड़ मुआवजा बंटा, २० अक्टूबर डेडलाइन
पुरंदर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण को चुनौती देने वाली किसानों की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी, अब प्रशासन ने सहमति देने की समय सीमा बढ़ा दी है।
पुरंदर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे किसानों को हाईकोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने २२ सितंबर को उनकी याचिका खारिज कर दी। ये किसान जमीन अधिग्रहण के खिलाफ थे और एयरपोर्ट की जगह बदलने की मांग कर रहे थे।
वनपुरी, कुंभारवळण, उदाचीवाडी, एखतपूर, मुंजवडी, खानवडी और पारगाव इन गांवों के ९६ प्रतिशत किसानों ने भूसंपादन के लिए अपनी सहमति दे दी है। अभी तक ९१० हेक्टर जमीन का अधिग्रहण पूरा हो चुका है और इससे जुड़े किसानों को करीब ३,८७५ करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जा चुका है। पुनर्वसन नीति का फायदा किसानों को मिले, इसके लिए सहमति देने की तारीख २५ सितंबर से १० अक्टूबर तक बढ़ा दी गई है।
प्रशासन का पूरा प्लान है कि भूसंपादन की पूरी प्रक्रिया २० अक्टूबर तक निपटा ली जाए। १० अक्टूबर के बाद बची हुई जमीनों का अधिग्रहण जबरदस्ती किया जाएगा, और ऐसे मामलों में पुनर्वसन नीति का फायदा नहीं मिलेगा, यह प्रशासन ने साफ कर दिया है।
जिला कलेक्टर जितेंद्र डूडी ने किसानों से अपील करते हुए कहा, "शासन ने किसानों के हित का ख्याल रखते हुए बड़ा पैकेज दिया है। बढ़ी हुई समय सीमा में किसानों का सहमति देना ही उनके हित में है। अगर सहमति से अधिग्रहण होता है तो १० प्रतिशत रिटर्न के साथ साथ पुनर्वसन नीति के तहत और भी फायदे मिलेंगे। सामूहिक किसान अपने अपने निजी सवाल सुलझाकर नुकसान भरपाई स्वीकार करें, ताकि रकम कोर्ट की प्रक्रिया में फंस न जाए।"
पुरंदर में छत्रपती संभाजीराजे ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए जो भूसंपादन हो रहा है, उसका विरोध कर रहे और एयरपोर्ट की जगह बदलने की मांग करने वाले किसानों की याचिका हाईकोर्ट ने २२ सितंबर को खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि एयरपोर्ट की जगह तय करना तकनीकी विशेषज्ञों के दायरे का विषय है और यह शासन के नीतिगत फैसले का हिस्सा है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि राज्य के नीतिगत फैसलों में दखल देने के लिए कोर्ट कोई विशेषज्ञ प्राधिकरण नहीं है। इसीलिए एयरपोर्ट के लिए तय की गई जगह के चुनाव को कोर्ट के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती, यह इस फैसले से साफ हो गया।
वहीं कोर्ट ने यह भी बताया कि भूसंपादन या नुकसान भरपाई को लेकर संबंधित प्राधिकरणों के पास जाने का अधिकार याचिकाकर्ताओं के पास है। कानून के मुताबिक मिल रही नुकसान भरपाई ठीक नहीं लगे तो संबंधित प्रावधानों के तहत उसे चुनौती देने का रास्ता भी खुला है।
याचिकाकर्ताओं के लोकस स्टैंडाई यानी दाद मांगने के कानूनी अधिकार को लेकर भी कोर्ट ने अहम बात कही। कोर्ट ने साफ किया कि राज्य सरकार के नीतिगत फैसले को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ताओं के पास जरूरी कानूनी अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद पुरंदर एयरपोर्ट की भूसंपादन प्रक्रिया को और रफ्तार मिलने की संभावना है।