पशुओं की सेहत सुधरी तो बनेगा विकसित भारत: गोदरेज एग्रोवेट के चेयरपर्सन बुर्जीस गोदरेज
बुर्जीस गोदरेज के मुताबिक पशुओं की संख्या बढ़ाने से नहीं, उन्हें ज़्यादा स्वस्थ रखने से प्रोटीन की कमी दूर होगी।
गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड के चेयरपर्सन बुर्जीस गोदरेज का कहना है कि भारत 2047 तक विकसित देश बनने की राह पर है, तो सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर काफी नहीं है। पशुओं की सेहत जैसे अहम पहलू को भी गंभीरता से लेना होगा। उनके मुताबिक ज़ोर पशुओं की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि उन्हें ज़्यादा स्वस्थ रखने पर होना चाहिए।
बुर्जीस गोदरेज ने कहा कि हम अपनी तरक्की हाईवे, एयरपोर्ट और ऊंची इमारतों से नाप रहे हैं। लेकिन उनकी राय में एक शांत मगर उतना ही ज़रूरी पैमाना हमसे छूट रहा है, और वह है हमारे पशुओं की सेहत। उनका मानना है कि इसका सीधा रिश्ता इंसान की सेहत, पोषण और खुशहाली से है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था परिपक्व होती है, लोगों का खान-पान भी बदलता है। अगर भारत के लोग विकसित देशों की तरह पूरा आहार लेना चाहते हैं, तो जो पशु हमें खाना देते हैं उनकी सेहत पर ध्यान देना होगा।
उन्होंने पूरी बात एक शब्द में समेटी: प्रोटीन। आमदनी बढ़ती है तो प्रोटीन वाले खाने की मांग भी बढ़ती है, और उनके मुताबिक यह बदलाव भारत में अभी से दिख रहा है। देश में प्रोटीन प्रोडक्ट्स का बाज़ार 2024 के 38,247 करोड़ रुपये से बढ़कर 2033 तक 1.36 लाख करोड़ रुपये होने का अंदाज़ा है। गोदरेज इसे उत्साह बढ़ाने वाली बात मानते हैं, पर कहते हैं कि यह बढ़त ज़्यादातर शहरी और लाइफस्टाइल पर टिकी है और प्रीमियम डेयरी प्रोडक्ट्स व पैकेज्ड फूड तक सीमित है।
आंकड़ों से आगे देखें तो भारत अब भी प्रोटीन की कमी वाला देश है। हम रोज़ औसतन करीब 70 ग्राम प्रोटीन लेते हैं। अमेरिका, कनाडा और चीन में यह 124 से 125 ग्राम है, पूरे यूरोपीय यूनियन में 82 ग्राम, और उप-सहारा अफ्रीका में भी 58 ग्राम। हमारे खाने का आधे से ज़्यादा प्रोटीन अब भी अनाज से आता है, जो पोषण की गाइडलाइन से काफी ज़्यादा है। वहीं शाकाहारी प्रोटीन के प्राकृतिक स्रोत दाल की थाली में हिस्सेदारी अब भी कम है।
गोदरेज के मुताबिक इस बहस में अक्सर गलत दिशा पकड़ ली जाती है। भारत में दुनिया में सबसे ज़्यादा पशुधन है और वह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा पोल्ट्री उत्पादक देश है। इसलिए प्रोटीन की कमी का जवाब पशुओं की संख्या बढ़ाना नहीं हो सकता। असली जवाब है जो पशु मौजूद हैं, उन्हें ज़्यादा स्वस्थ बनाना।
उनका कहना है कि स्वस्थ पशुओं से ज़्यादा और बेहतर क्वालिटी का दूध, मांस और अंडे मिलते हैं। उनकी नज़र में खराब सेहत ही इस सेक्टर की उत्पादकता में सबसे बड़ी रुकावट है। उन्होंने समझाया कि आनुवंशिकता क्षमता की ऊपरी सीमा तय करती है, पोषण तय करता है कि हम उस सीमा के कितने करीब पहुंचते हैं, और सेहत तय करती है कि असल में हाथ क्या आता है। बीमारियों की वजह से हर साल करीब 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो रहा है। गोदरेज के मुताबिक इसका इलाज पेचीदा नहीं है: टीकाकरण, वक्त पर जांच, बायो-सिक्योरिटी, और सबसे अहम, बीमारी के बाद इलाज की जगह ऐसा पौष्टिक चारा जो पाचन तंत्र मज़बूत करे और रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए।
उन्होंने औपचारिकीकरण पर भी बात की। उनके मुताबिक असंगठित और बिखरे कारोबार को भरोसेमंद ब्रांड्स में बदलने से अनुशासन आता है। आज भारत का सिर्फ 25 प्रतिशत दूध औपचारिक रास्तों से बिकता है। नारियल तेल, खाने के तेल और मखाने तक आम कृषि उपज से भरोसेमंद ब्रांड बन चुके हैं। यही तरीका डेयरी, मांस और पोल्ट्री में भी बदलाव ला सकता है, जिसका फायदा किसान और ग्राहक दोनों को मिलेगा।
गोदरेज ने टिकाऊपन का मुद्दा भी उठाया। दुनिया के उत्सर्जन में पशुपालन का हिस्सा करीब पांचवां है। उनके मुताबिक जानवरों की संख्या बढ़ाने की जगह बोवेयर और मोनेन्सिन जैसे फीड सप्लिमेंट के साथ स्मार्ट पोषण अपनाया जाए, तो मीथेन उत्सर्जन 45 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है।
पालतू जानवरों के तेज़ी से बढ़ते कारोबार की ओर भी उन्होंने ध्यान दिलाया। 2018 से 2023 के बीच पालतू जानवरों की संख्या करीब दोगुनी हो गई, और 2033 तक पेट फूड की मांग भी इसी रफ्तार से बढ़ेगी। फिर भी हम हर साल आयात पर ज़्यादा निर्भर होते जा रहे हैं। विकसित भारत की सोच में आत्मनिर्भरता केंद्र में है, तो इस क्षेत्र में भी देश के अंदर उत्पादन क्षमता बनानी होगी।
आखिर में गोदरेज ने कहा कि देश की असली तरक्की वहां के नागरिकों की सेहत से नापी जाती है, और उन्हें पक्का यकीन है कि इसमें पशुओं की सेहत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। ध्यान सिर्फ संख्या बढ़ाने पर नहीं, पशुओं को ज़्यादा स्वस्थ रखने पर होना चाहिए।