मीरा रोड की स्कूल में पर्युषण पर्व पर टिफिन में प्याज-लहसुन बैन, विवाद गरमाया
भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता से जुड़ी बताई जा रही सेव्हन स्क्वेअर अकॅडमी के फरमान पर मनसे ने शिक्षा अधिकारियों से कार्रवाई की मांग की है
स्कूल सिर्फ चार दीवारों के भीतर पढ़ाई की जगह नहीं होती, बल्कि यह बराबरी और एक-दूसरे की सोच के सम्मान का पहला पाठ भी सिखाती है। लेकिन जब कोई शिक्षण संस्था धार्मिक पर्व के नाम पर बच्चों के टिफिन में क्या हो और क्या न हो, यह तय करने लगे, तो शिक्षा के मकसद पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। मीरा रोड की मशहूर सेव्हन स्क्वेअर अकॅडमी ने पर्युषण पर्व के मौके पर जो सर्कुलर जारी किया है, उसने महाराष्ट्र में इस संवेदनशील मुद्दे पर तीखी बहस छेड़ दी है। इस पूरे विवाद के केंद्र में खाने की आजादी, धार्मिक रीति और प्रशासनिक सख्ती का टकराव है।
असल विवाद यह है कि मीरा रोड की सेव्हन स्क्वेअर अकॅडमी ने जैन धर्म के पवित्र पर्युषण पर्व के मद्देनजर एक खास सर्कुलर निकाला है। इस निर्देश के मुताबिक, 16 सितंबर तक स्कूल के सभी बच्चों को अपने टिफिन में प्याज, लहसुन, चुकंदर, आलू और जमीन के नीचे उगने वाली बाकी कंदमूल सब्जियां लाने पर सख्त पाबंदी लगाई गई है। खास बात यह है कि यह नियम सिर्फ बच्चों के टिफिन तक सीमित नहीं, बल्कि स्कूल की कैंटीन में भी इस दौरान ऐसे पदार्थ नहीं मिलेंगे, यह साफ कर दिया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्कूल भाजपा के स्थानीय विधायक नरेंद्र मेहता और उनके परिवार का निजी स्कूल है। इसी वजह से इस फैसले को धार्मिक आचरण जबरन थोपने की कोशिश माना जा रहा है। इस फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने आक्रामक रुख अपनाते हुए शिक्षा अधिकारियों के पास शिकायत दर्ज कराई है और स्कूल के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। बच्चों के खाने-पीने पर इस तरह सीधी पाबंदी लगाने का अधिकार स्कूल प्रशासन को किसने दिया, यही सवाल अब उठाया जा रहा है।
जैन धर्म में पर्युषण पर्व का बहुत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व है। इस पर्व के दौरान सभी जीवों के प्रति करुणा, दया और अहिंसा का संदेश दिया जाता है। कंदमूल न खाने के पीछे जमीन के नीचे मौजूद सूक्ष्म जीवों की हिंसा से बचने का धार्मिक मकसद होता है। इस पर्व और इसके पीछे की सोच का सम्मान होना ही चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं। जैन बच्चों की भावनाओं का ख्याल रखने के लिए स्कूल कुछ पहल करें या माहौल बनाएं, यह अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि एक तबके के धार्मिक रीति-रिवाज का सम्मान करते हुए बाकी धर्मों या अलग सोच रखने वाले बच्चों की निजी आजादी पर रोक लगाना कितना सही है? भारत जैसे विशाल देश में सर्वधर्म समभाव ही हमारी पहचान है। ऐसे में किसी एक खास धर्म के नियम सबके लिए बने स्कूल में सभी पर जबरदस्ती लागू करना सम्मान से ज्यादा दबाव लगता है।
किसी भी नागरिक या बच्चे को अपनी आस्था के मुताबिक खाना चुनने का पूरा हक है। अगर कोई बच्चा या उसका परिवार खुद पर्युषण में प्याज-लहसुन छोड़ता है, तो यह उनका निजी और धार्मिक फैसला है। लेकिन उसी स्कूल में पढ़ने वाले दूसरे बच्चे या परिवार की पसंद का ख्याल रखे बिना सबके लिए बैन लगा देना निजी आजादी पर हमला है। अगर हर धर्म और संप्रदाय की खान-पान परंपरा और व्रत के नियम सभी बच्चों पर जबरदस्ती लागू किए जाने लगें, तो स्कूल व्यवस्था कैसे चलेगी? हिंदू धर्म में सावन के महीने में मांसाहार वर्जित माना जाता है, कुछ जाति-धर्मों में खास दिन कंदमूल नहीं खाए जाते, वहीं बाकी धर्मों में भी अलग-अलग खान-पान के नियम हैं। अगर स्कूल हर त्योहार और पर्व पर ऐसे नियम लागू करने लगें, तो क्लासरूम में धार्मिक आधार पर मतभेद पैदा होगा। स्कूल किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि सभी धर्मों के बच्चों के लिए होता है। इसलिए एक तबके की खुशी का ख्याल रखते हुए दूसरे बच्चे की आजादी पर आंच न आए, ऐसा संतुलित रुख प्रशासन को अपनाना जरूरी है।
इस पूरे मामले को राजनीतिक और सामाजिक रंग देना बेहद खतरनाक हो सकता है। यह विवाद इस बात का बिल्कुल नहीं है कि कौन सा धर्म बड़ा है या कौन सी परंपरा सही है। असली सवाल यह है कि स्कूल के प्रशासनिक नियमों का आधार क्या होना चाहिए? सेहत का अनुशासन, सुरक्षा के नियम और बच्चों की शारीरिक-मानसिक बढ़त, इन्हीं आधार पर स्कूल के नियम तय होने चाहिए। लेकिन धार्मिक आचरण के आधार पर सभी बच्चों का डाइट चार्ट तय करना शिक्षा विभाग के नियमों के दायरे में आता है या नहीं, यह जांच का विषय है। यह मसला हिंदू बनाम जैन का नहीं, बल्कि निजी आजादी बनाम संस्थागत जबरदस्ती का है।
स्कूल की चारदीवारी के भीतर बच्चों को धार्मिक सद्भाव और आपसी सम्मान के सबक सिखाए जाने चाहिए, जबरदस्ती नहीं। पर्युषण पर्व के मौके पर स्कूल जैन धर्म का महत्व, क्षमा मांगने की सोच और अहिंसा का संदेश बच्चों तक पहुंचाएं, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि जैसे तुम्हारी आस्था तुम्हारे लिए जरूरी है, वैसे ही सामने वाले की पसंद भी उतनी ही अहम हो सकती है। पर्युषण की असली भावना 'मिच्छामी दुक्कडम्' है, यानी मन, वचन और कर्म से किसी का दिल न दुखाना और माफी मांगना। फिर इसी पर्व का असली सम्मान बच्चों पर पाबंदी लगाकर कैसे हो सकता है? आपसी सम्मान और संयम का यही संदेश अगर स्कूल खुद अमल में लाकर दिखाएं, तो यह बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए ज्यादा फायदेमंद होगा।
स्कूलों में बच्चों के खाने में क्या हो और क्या न हो, यह बहुत नाजुक मसला है। अगर यह नियम सेहत से जुड़ा होता, तो पैरेंट्स भी इसका स्वागत करते। लेकिन सिर्फ एक धार्मिक पर्व की जिद पर सभी बच्चों पर इसे थोपना गलत है। कल अगर दूसरे धर्मों के त्योहार आएंगे, तो क्या उनके नियम भी मानने होंगे, इस सवाल का जवाब अब स्कूल प्रबंधन, पैरेंट्स और शिक्षा विभाग को देना ही होगा। आस्था का सम्मान जबरदस्ती से नहीं, बल्कि बातचीत और अपनी मर्जी से होना चाहिए, तभी असल मायने में स्कूल का मंदिर सुरक्षित रह पाएगा।