ल्युपिन की रिसर्च का सफर: API से लेकर नई दवाओं तक भारतीय फार्मा की छलांग
भारत में 1991 में उदारीकरण शुरू हुआ। तब तक दुनिया की बड़ी कंपनियां काफी आगे निकल चुकी थीं, इसलिए भारतीय कंपनियों को उनकी बराबरी करने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ा। यही वजह है कि भारतीय कंपनियों में नवोन्मेष को परखना हो तो 1991 को शुरुआती बिंदु मानना जरूरी है।
भारतीय दवा कंपनियों पर भी यही बात लागू होती है। निजी बुनियादी रिसर्च के लिए सरकारी फंड नहीं था, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद जैसी सरकारी संस्थाओं में लगे पैसे पर रिटर्न कम मिलता था और यूनिवर्सिटियों का प्रशासन कमजोर था। इन सबके बावजूद भारतीय दवा कंपनियों ने दुनिया के प्रतिस्पर्धियों से कामयाबी के साथ मुकाबला किया।
ल्युपिन की रिसर्च इस सफर की अच्छी मिसाल है। शुरुआत जल्दी हो गई थी। पहले औरंगाबाद के ल्युपिन प्लांट में और फिर मंडीदीप में काम बढ़ाया गया। यहां कंपनी ने दवा बनाने में लगने वाले सक्रिय औषधी घटकों यानी बुनियादी कच्चे माल को डेवलप करना शुरू किया।
आलोचकों ने इसे 'उलट इंजीनियरिंग' और 'नकल' कहा, लेकिन पेटेंट कानून के बाद उद्योग के विकास में इसकी अहम भूमिका रही। इस कानून की वजह से ऐसी उत्पादन प्रक्रियाएं बनाना मुमकिन हुआ जो पेटेंट का उल्लंघन न करें। 1980 के दशक में भारत सक्रिय औषधी घटकों के वैश्विक सप्लायर के तौर पर उभरा और 2024 तक दुनिया के सक्रिय औषधी घटकों के उत्पादन में भारत का हिस्सा करीब 32 टक्का हो गया।
ल्युपिन ने मौजूदा दवाओं की प्रोसेस केमिस्ट्री, रासायनिक बनावट और संश्लेषण के रास्तों को समझने में निवेश किया। ऐसी ही एक दवा कैप्टोप्रिल थी। 1990 के दशक की शुरुआत तक ल्युपिन जैसी भारतीय कंपनियां कैप्टोप्रिल की उलट इंजीनियरिंग कर चुकी थीं और इसे मूल उत्पाद की सिर्फ 5 टक्का कीमत पर उपलब्ध करा रही थीं।
ल्युपिन की रिसर्च में बड़ी छलांग 2005 में आई, जब मुंह से ली जाने वाली और इंजेक्शन से दी जाने वाली सेफैलोस्पोरिन दवाओं को अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की मंजूरी मिली। इसके लिए ल्युपिन की रिसर्च और डेवलपमेंट टीमों ने सेफैलोस्पोरिन के सक्रिय औषधी घटकों में अपनी महारत का सहारा लिया। उन्होंने मुंह से और इंजेक्शन से दी जा सकने वाली दवाओं के रूप तैयार किए। इसमें पेटेंट की अड़चनों से पार पाना था, और दवा शरीर में कितनी मात्रा में उपलब्ध होती है और कितनी स्थिर रहती है, यह पक्का करने के लिए उत्पादन प्रक्रिया पर सटीक कंट्रोल भी जरूरी था।
इसके बाद टीम ने दिल और रक्तवाहिनियों की बीमारियों और डायबिटीज की दवाओं जैसे लंबे इलाज वाले क्षेत्रों के लिए उत्पाद बनाए। आगे चलकर यही क्षेत्र अमेरिका में ल्युपिन के जेनेरिक दवाओं के पोर्टफोलियो में सबसे अहम रहे। दशक के आखिर तक अमेरिका में जेनेरिक दवाओं के लिए ल्युपिन को 75 से ज्यादा मंजूरियां मिल चुकी थीं। अगले दशक में कंपनी ने 129 दवाओं की ड्रग मास्टर फाइलें और 186 एब्रीविएटेड न्यू ड्रग एप्लिकेशन दाखिल कीं और भारतीय कंपनियों में सबसे व्यापक जेनेरिक दवाओं की उत्पाद श्रृंखला बनाई।
दवा को शरीर तक पहुंचाने की तकनीक में डॉ. देश बंधू गुप्ता और ल्युपिन के ड्रग डिलीवरी रिसर्च और डेवलपमेंट विभाग के प्रमुख हिमाद्री सेन की खास दिलचस्पी थी। सेन ने रैनबैक्सी के अमेरिका के सफर को एक दशक तक दिशा देने के बाद 2000 में ल्युपिन जॉइन किया था। दोनों के मुताबिक यह ज्यादा नए उत्पादों की तरफ बढ़ने का अहम कदम था।
Suprax के आसपास बने बच्चों की दवाओं की श्रृंखला ने कंपनी के लिए मौजूदा जानकारी के सहारे नवोन्मेष का रास्ता खोला, यानी मंजूरी के लिए नए सिरे से क्लिनिकल ट्रायल करने की जरूरत नहीं पड़ी। Antara ब्रांड के मौके ने भी यही रास्ता दिखाया। इन उत्पादों को 'क्रमिक नवोन्मेष' कहा गया, फिर भी इन्होंने डॉक्टरों और मरीजों की अधूरी जरूरतें पूरी कीं।
इनमें से कुछ उत्पादों की बदौलत जो गोली दिन में 2 बार लेनी पड़ती थी, उसे दिन में सिर्फ 1 बार लेना मुमकिन हुआ। कुछ उत्पादों ने इंजेक्शन से दी जाने वाली दवा को इस्तेमाल में आसान इन्हेलर में बदल दिया। इन शुरुआती नवोन्मेषों ने विशेष दवा कारोबार की नींव का काम किया, जिससे ल्युपिन सिर्फ जेनेरिक दवाओं तक सीमित नहीं रही और अपने कारोबार में विविधता ला सकी। ये अंश Manish Sabharwal और Sundeep Khanna की किताब Made in India: The Story of Desh Bandhu Gupta, Lupin and Indian Pharma से लिए गए हैं, जिसे Juggernaut ने प्रकाशित किया है।