कल्याण में पद्मिनी प्रीमियर को ६० साल पहले मिली जमीन के मामले में अब SIT जांच
कल्याण में प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स को 1962-65 में दी गई 170 एकर से ज्यादा जमीन के आवंटन पर अब, छह दशक बाद, महसूल विभाग ने SIT बिठा दी है।
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कल्याण की मशहूर पद्मिनी प्रीमियर गाड़ी बनाने वाली कंपनी प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स को दी गई जमीन के आवंटन को लेकर महसूल विभाग के कामकाज पर ही सवाल उठ खड़े हुए हैं। बात 60 साल से भी पुरानी है, यानी 1962 से 1965 के बीच अलग-अलग सरकारी आदेशों के जरिए 170 एकर से ज्यादा जमीन दी गई थी। इसी जमीन की जांच के लिए 4 सितंबर 2026 को एक SIT बनाई गई है।
खास बात यह है कि यह जांच कांग्रेस नेता नाना पटोले की शिकायत पर महसूल मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे के आदेश से शुरू की गई है। शिकायत मिलने के सिर्फ 8 दिन के भीतर, बिना किसी प्रारंभिक जांच के, यह समिति बना दी गई, जिस पर हैरानी जताई जा रही है।
एक तरफ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस रोजगार बढ़ाने के लिए उद्योगों को बढ़ावा दे रहे हैं, और दूसरी तरफ महसूल विभाग इस तरह की अनावश्यक कागजी कार्रवाई से उद्योगों को परेशान कर रहा है। ऐसे में राज्य में उद्योग कैसे आएंगे और रोजगार कैसे बनेगा, यह सवाल भी उठाया जा रहा है।
प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स की स्थापना 1944 में सोलापुर के उद्योगपति सेठ वालचंद हिराचंद दोशी ने सर एम. विश्वेश्वरय्या के प्रोत्साहन से की थी। आजादी के बाद देश में जो शुरुआती गाड़ियां सीधे बनाई गईं, उनमें से कुछ प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स ने भी बनाई थीं। 1953 में वालचंद हिराचंद के निधन के बाद उनके भाई लालचंद हिराचंद ने कंपनी की कमान संभाली। महाराष्ट्र के औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार के कहने पर हिराचंद परिवार राज्य में उत्पादन बढ़ाने के लिए राजी हुआ था। इसी के तहत 1962 से 1965 के बीच ठाणे जिले के कल्याण तालुका में 170 एकर से ज्यादा जमीन प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स को अलग-अलग आदेशों के जरिए दी गई। उस वक्त यह इलाका दूर-दराज का था और वहां औद्योगिक गतिविधियां कम थीं। मकसद यह था कि रोजगार पैदा करने के लिए प्रीमियर एक बड़ी औद्योगिक यूनिट बनाए और कुछ जमीन कर्मचारियों के रहने के लिए इस्तेमाल करे।
अब, इस जमीन के मूल आवंटन को छह दशक से ज्यादा हो जाने के बाद इसकी जांच के लिए SIT बनाई गई है। इतने लंबे समय बाद हो रही इस जांच के समय और इसके पीछे प्रशासन की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच, कंपनी के आर्थिक संकट में आने के बाद उसकी जमीन का कुछ हिस्सा अलग-अलग पक्षों को बेचा गया। करीब 55 एकर जमीन अनंत डेव्हलपर्स को विकास करार के तहत दी गई, जबकि कुछ जमीन बेचकर कंपनी ने विभाग का बकाया चुकता करने का दावा किया है। फिलहाल 170 एकर जमीन में से 57 एकर रुनवाल समूह के पास, 55 एकर लोढा डेव्हलपर्स के पास, 41 एकर संदुर निवास प्रोपायटीज के पास और करीब 13 एकर अलग-अलग सरकारी विभागों के पास है।
अनंत डेव्हलपर्स के डायरेक्टर भरत नरसाना कहते हैं कि एक तरफ 1960 के दशक में औद्योगिक विकास और रोजगार के लिए लिए गए फैसले, उसके बाद बदली जमीन इस्तेमाल की स्थिति, कोर्ट-कचहरी की प्रक्रिया और सरकार को सारे शुल्क चुका दिए जाने के बावजूद अब 60 साल बाद SIT जांच बिठाने का फैसला प्रशासन ने लिया है। उनका कहना है कि यह फैसला किसी न किसी के दबाव में लिया गया लगता है, और अगर हालात ऐसे ही रहे तो महाराष्ट्र में आगे उद्योगपति क्यों रहें, यह सवाल भी उन्होंने उठाया।
औद्योगिक निवेश, जमीन आवंटन और विकास प्रोजेक्ट्स को लेकर सरकार के हर पुराने फैसले की अगर दशकों बाद जांच शुरू हो जाए, तो आगे चलकर उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर के फैसले लेने वाले प्रशासन को इसका क्या नतीजा भुगतना पड़ेगा, यह सवाल भी इस मामले के बहाने उठ रहा है। एक तरफ उद्योगों को जमीन देकर रोजगार और विकास को बढ़ावा देने की नीति, और दूसरी तरफ छह दशक बाद उन्हीं फैसलों की जांच, इस पर भी सवाल है कि महसूल विभाग का यह तरीका असल में विकास को बढ़ावा दे रहा है या फैसले लेने की प्रक्रिया में रुकावट डाल रहा है। कांग्रेस के विधायक के 11 अगस्त के पत्र पर आठ दिन में बैठक होकर 19 अगस्त तक फैसला हो जाता है, इस रफ्तार और इसकी दिशा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।