जीने का मतलब क्या है? खुद से पूछे जाने वाले कुछ सवाल बदल सकते हैं नजरिया
रोज की भागदौड़ में खुद से पूछने लायक सवाल: पैसे, लाइक्स, रिश्ते और सुकून के बारे में।
प्रकाश बाविस्कर, नवी मुंबई के इस लेख में जिंदगी के मतलब को लेकर खुद से पूछे जाने वाले सवाल रखे गए हैं। लेख कहता है कि रोज उठना, काम करना, जिम्मेदारियां निभाना और रात को थककर सो जाना, दिन ऐसे ही आगे बढ़ते रहते हैं। इस भागदौड़ में कभी खुद से पूछना चाहिए कि आखिर मैं जी किसलिए रहा हूं। सिर्फ दिन काटने के लिए, या मिली हुई जिंदगी में कोई मतलब पैदा करने के लिए?
पैसा, सुरक्षा, प्यार और इज्जत की चाह स्वाभाविक है। लेकिन सब कुछ मिलने के बाद भी मन बेचैन रहे, तो सवाल यह है कि मुझे और चीजें चाहिए या खुद को समझने की जरूरत है। और क्या मैं अपने सुकून की शर्त बार-बार बदल तो नहीं रहा?
जिंदगी का मतलब सिर्फ किसी बड़ी कामयाबी में नहीं होता। मैं पैदा क्यों हुआ, इसका पक्का जवाब किसी के पास नहीं है। आस्था और फलसफा अलग-अलग बातें कहते हैं। पर इस राज के खुलने तक जीना रोका तो नहीं जा सकता। आज हाथ में जो वक्त, ताकत और मौके हैं, उनका इस्तेमाल करके शुरुआत की जा सकती है। किसी की मुश्किल कम हुई, किसी को सहारा मिला या कोई काम ईमानदारी से पूरा हुआ, तो उसकी भी अहमियत है। दुनिया ने ध्यान नहीं दिया, इससे अच्छे काम की कीमत कम नहीं होती।
सोशल मीडिया पर फेसबुक पोस्ट डालना, व्हॉट्सऐप स्टेटस रखना और बार-बार रिएक्शन देखना आम बात है। कितने लाइक आए, किसने तारीफ की, किसने अनदेखा किया। लेख पूछता है कि मैंने अपनी बात रखी थी या अपनी कीमत तय करने का हक दूसरों को दे दिया था। फोटो पर कम रिएक्शन आए, तो क्या उस पल की खुशी कम हो गई? काम की अच्छी राय सुनी जाए और गलती हो तो सुधारी जाए, पर हर ताने को मन में रखना जरूरी नहीं। अपने काम का संतोष खुद को भी महसूस होना चाहिए।
पोस्ट डालने के बाद बेचैनी रहती हो, तो कुछ वक्त के लिए उन्हें बंद किया जा सकता है। नोटिफिकेशन बंद किए जा सकते हैं और परेशान करने वाले अकाउंट म्यूट किए जा सकते हैं। हर अनुभव को सबके सामने रखना जरूरी नहीं। कुछ खुशियां सिर्फ जीने के लिए रखी जाएं, तब भी वे खुशी ही रहती हैं।
दूसरे की गाड़ी, विदेश यात्रा या इनाम देखकर अपनी जिंदगी अधूरी क्यों लगे? हमें उसका चुना हुआ पल दिखता है, पूरी हालत नहीं। उससे प्रेरणा ली जा सकती है, पर अपने सफर को कम नहीं आंकना चाहिए। हर किसी की जिम्मेदारियां और आगे बढ़ने की रफ्तार अलग हो सकती है।
रिश्तों में अंदाजे से ज्यादा बातचीत मायने रखती है। कोई ऑनलाइन होकर भी जवाब न दे, तो तुरंत बुरा लग जाता है। पर इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। एक ब्लू टिक से रिश्ते का फैसला क्यों किया जाए? रिश्ता अहम है तो अंदाजे लगाने की बजाय शांति से बात करना ज्यादा काम का है। व्हॉट्सऐप ग्रुप के हर झगड़े में उतरकर क्या मिलता है? बात रखनी जरूरी हो तो रखी जाए, पर चर्चा बेइज्जती में फंस जाए तो रुक जाना बेहतर है। हर किसी को मनाना अपनी जिम्मेदारी नहीं है। वक्त और मन की ताकत कहां खर्च करनी है, यह भी खुद तय किया जा सकता है।
घर में होकर भी ध्यान फोन में रहता है, तो अपने लोगों को साथ कैसे मिलेगा? फोन एक तरफ रखकर उनकी बात सुनी जाए और उनके दिन के बारे में पूछा जाए, तो रिश्तों में गर्माहट आएगी। प्यार दिल में रखने के साथ बर्ताव से दिखाना भी जरूरी है।
खुशी को हम बार-बार अगली तारीख देते हैं, यह काम हो जाए या इतना पैसा आ जाए। पर नए लक्ष्य आते ही रहेंगे। तो आज की चाय, इत्मीनान की सैर, पसंदीदा गाना और अपनापन भरी बातचीत के लिए सारी समस्याएं खत्म होने का इंतजार क्यों? संतोष का मतलब महत्वाकांक्षा छोड़ना नहीं है। जो पास है उसकी कद्र करके आगे की कोशिश की जा सकती है। कल से आज थोड़ा ज्यादा सीखना और थोड़ा सुधरना भी तरक्की है।
सब कुछ अपने काबू में नहीं होता। दूसरों का बर्ताव, बीता वक्त और हर नतीजा बदला नहीं जा सकता। पर अपनी तैयारी, कदम और जवाब पर काम हो सकता है। जो बदला जा सकता है उसके लिए कोशिश की जाए, बाकी के लिए खुद को बार-बार दोष न दिया जाए।
हर दिन खुशी का हो, ऐसा नहीं होता। दुख, नाकामी या जुदाई आए तो खुद को संभलने का वक्त दिया जाए। भरोसेमंद इंसान से बात की जाए और जरूरत हो तो सही मदद ली जाए। दुखी होने का मतलब जिंदगी बेमतलब हो गई, यह नतीजा क्यों निकालें? दूसरों की फिक्र करते हुए अपनी हद का भी ध्यान रखना चाहिए। जो नहीं हो सकता, वह नरमी से बताया जा सकता है। सबको खुश रखने में खुद को थकाना जरूरी नहीं। मदद दिल से की जाए, पर अपनी सेहत, आराम और जरूरी जिम्मेदारियों की कीमत पर नहीं।
शरीर और मन रोज साथ देते हैं। उनके लिए काफी नींद, सही खाना, हल-चल और थोड़ी शांति रखी जाती है या नहीं? थकने पर आराम करना आलस नहीं है। कल के काम के लिए खुद को तैयार रखना भी आज की अहम जिम्मेदारी है।
लेख दिन की शुरुआत और अंत खुद से करने की बात भी कहता है। सुबह फोन खोलने से पहले पूछा जाए कि आज कौन सा एक काम अर्थपूर्ण है, और उसे पूरा करने की कोशिश हो। दिन में किसी से दिल से बात हो, थोड़ी सैर हो और जहां हो सके मदद हो। छोटे काम रोज होते रहें तो जिंदगी को सहारा मिलता है। रात को सिर्फ यह हिसाब न हो कि क्या रह गया। आज क्या सीखा, कौन सा पल अच्छा लगा और किसके लिए शुक्रगुजार महसूस हुआ, यह भी याद किया जाए। गलती हो तो सुधारी जाए, पर एक गलती के लिए पूरे व्यक्तित्व को दोष न दिया जाए।
शायद जिंदगी का मतलब रोज बनता रहता है, खुद को गढ़ने में, रिश्ते निभाने में, ईमानदारी से काम करने में और दूसरे की जिंदगी में थोड़ी रोशनी लाने में। जिंदगी परफेक्ट न हो, फिर भी अर्थपूर्ण हो सकती है। आज मैं दिल से जिया या नहीं, यही सवाल खुद से पूछते रहना है। रोज खुश दिखना जरूरी नहीं, पर खुशी को जगह दी जा सकती है। सब कुछ नहीं मिलेगा, पर जो मिला उसकी कद्र की जा सकती है। अपनी जिंदगी दूसरों की प्रतिक्रियाओं के हवाले करने की बजाय उसे दिशा देने का छोटा फैसला आज लिया जा सकता है।