गांधी जयंती: पोरबंदर से साबरमती तक, बापू की जिंदगी के पांच मोड़ जिन्होंने इतिहास रचा
2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर उनके जीवन के अहम पड़ावों पर एक नज़र।
भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम सबसे ऊपर दर्ज दिखेगा। मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था, जो समंदर किनारे का एक छोटा सा शहर है। आगे चलकर वे सिर्फ एक देश के नेता नहीं रहे, बल्कि पूरी इंसानियत को शांति और नैतिकता की नई राह दिखाने वाले 'महात्मा' कहलाए। आज के तेज़ और डिजिटल दौर में, जब दुनिया भर में हिंसा और तनाव का माहौल दिखता है, गांधीजी के विचार और भी ज़्यादा काम के लगते हैं।
गांधीजी की शुरुआती पढ़ाई भारत में हुई। इसके बाद उन्होंने लंदन जाकर कानून की पढ़ाई की। वकालत के सिलसिले में वे दक्षिण अफ्रीका गए, जहां उन्हें नस्लभेद का बहुत बुरा अनुभव हुआ। रेलवे के पहले दर्जे का टिकट होने के बावजूद उन्हें सिर्फ उनकी त्वचा के रंग की वजह से ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था। यह घटना उनकी ज़िंदगी का मोड़ साबित हुई। उन्होंने वहीं अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई और पहली बार 'सत्याग्रह' नाम के अहिंसक हथियार का कामयाब इस्तेमाल किया।
साल 1915 में भारत लौटने के बाद गांधीजी ने पूरे देश का दौरा किया। उन्होंने आम लोगों की असली गरीबी, तकलीफें और ब्रिटिश हुकूमत के जुल्म करीब से देखे। गोपाल कृष्ण गोखले को उन्होंने अपना राजनीतिक गुरु माना और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ज़रिए आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय हिस्सा लिया। भारत में अपने सत्याग्रह की शुरुआत उन्होंने चंपारण और खेड़ा के किसान आंदोलनों से की।
गांधीजी के खड़े किए जन आंदोलन सिर्फ सियासी लड़ाई नहीं थे। वे भारतीय समाज को एक साथ जोड़ने वाली सांस्कृतिक और सामाजिक मुहिम भी थे। साल 1920 का असहयोग आंदोलन, 1930 की मशहूर दांडी यात्रा यानी नमक सत्याग्रह और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, इन बड़े आंदोलनों ने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी। गांधीजी की एक पुकार पर करोड़ों भारतीय सड़कों पर उतर आए और अहिंसा के रास्ते से आज़ादी की मांग की।
महात्मा गांधी की ज़िंदगी की सबसे बड़ी खासियत थी सादगी और ऊंचे विचारों का मेल। उन्होंने सूत कातने के लिए चरखे का इस्तेमाल किया, जो आगे चलकर भारत के स्वावलंबन और स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बन गया। साबरमती आश्रम की स्थापना करके उन्होंने मेहनत की इज़्ज़त, सफाई और सभी धर्मों के प्रति समान भाव का संदेश दिया।
गांधीजी का कहना था, "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।" जो उसूल उन्होंने खुद अपनी ज़िंदगी में नहीं उतारा, वह उन्होंने किसी दूसरे को नहीं सिखाया। सत्य और अहिंसा को वे अपनी ज़िंदगी की दो आंखें मानते थे। उनके इन विचारों से सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला जैसे कई दुनिया के नेताओं को भी अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा मिली।
2 अक्टूबर को पूरी दुनिया में 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के तौर पर मनाया जाता है। यह दिन याद दिलाता है कि बड़ी जंग या हिंसा के बिना भी, सिर्फ नैतिक ताकत और आत्मविश्वास के दम पर दुनिया की सबसे बड़ी सत्ता को झुकाया जा सकता है। गांधीजी के विचार सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं हैं, वे आज की नौजवान पीढ़ी के लिए बेहतर ज़िंदगी जीने का रास्ता भी हैं।