गांधी जयंती पर नागपुर सेंट्रल जेल में बंदी कल्याण दिवस, कैदी पेश करेंगे गीत और नाटिकाएं
नागपुर सेंट्रल जेल में 2 अक्टूबर को कैदी अपने लिखे गीत और सामाजिक संदेश वाली नाटिकाएं पेश करने की तैयारी में हैं।
नागपुर मध्यवर्ती कारागृह यानी सेंट्रल जेल में इस बार भी बंदी कल्याण दिवस कई कार्यक्रमों के साथ मनाया जाएगा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर हर साल 2 अक्टूबर को यह दिवस मनाया जाता है। कैदियों की कला को मंच देने और उनके मन में सकारात्मक सोच जगाने के मकसद से इस मौके पर कई सांस्कृतिक कार्यक्रम रखे गए हैं।
महात्मा गांधी अपराध और अपराधी को देखते समय सुधार, बदलाव और इंसानियत को अहमियत देते थे। उनकी सोच यह थी कि कोई भी इंसान जन्म से गुनहगार नहीं होता। हालात, सामाजिक माहौल और अलग-अलग वजहों से किसी से जुर्म हो सकता है। इसलिए जुर्म करने वाले से सिर्फ नफरत करने के बजाय उसके भीतर की इंसानियत को जगाया जाए और उसे खुद को बदलने का मौका मिले, यही गांधीजी के विचारों का बुनियादी संदेश था। इसी मानवतावादी नजरिए की वजह से बंदी कल्याण दिवस का खास महत्व है।
नागपुर सेंट्रल जेल का ध्येय वाक्य 'सुधार और पुनर्वसन' है। इसी के मुताबिक कैदियों के हर तरह के विकास के लिए अलग-अलग गतिविधियां चलाई जाती हैं। सजा काटते हुए ही कैदियों को अपनी अच्छी खूबियां निखारने का मौका मिले, उनमें आत्मविश्वास आए और रिहाई के बाद वे समाज की मुख्य धारा में जिम्मेदार नागरिक की तरह फिर खड़े हो सकें, इसके लिए स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग, सांस्कृतिक कार्यक्रम, कला की तालीम और मार्गदर्शन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इस साल के सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए कैदियों ने खुद लिखे गीत तैयार किए हैं। इसके अलावा महात्मा गांधी और देश के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के जीवन और काम पर आधारित गीत भी पेश करने की तैयारी है। साथ ही सामाजिक संदेश देने वाली नाटिकाएं भी पेश की जाएंगी।
इस कार्यक्रम से कैदियों को अपनी छिपी हुई कला दिखाने का मौका मिलेगा और राष्ट्रपुरुषों के विचारों को भी याद किया जाएगा। कला, संस्कृति और सकारात्मक सोच के जरिए कैदियों की जिंदगी में बदलाव लाने की कोशिश इस पहल से की जा रही है।
कार्यक्रम को कामयाब बनाने के लिए नागपुर सेंट्रल जेल के अधीक्षक वैभव आगे, अतिरिक्त अधीक्षक दीपा आगे, उपअधीक्षक श्रीधर काळे और वरिष्ठ जेल अधिकारी भोसले, निमजे, लोमटे और शिंदे ने खास मेहनत की है। कैदियों को सांस्कृतिक कार्यक्रमों की ट्रेनिंग देने का अहम काम रोहन बच्छाव ने किया है।
बताया गया है कि यह सांस्कृतिक आयोजन कैदियों की छिपी कला को बढ़ावा देने के साथ उनमें आत्मविश्वास और सकारात्मकता का भाव पैदा करेगा। सुधार और पुनर्वसन की प्रक्रिया को ताकत देते हुए कैदियों को नई जिंदगी की राह दिखाने का संदेश इस पहल से दिया जाएगा। महात्मा गांधी के मानवतावादी विचारों की विरासत को संभालते हुए कैदियों को समाज की मुख्य धारा में फिर शामिल करने की दिशा में यह कार्यक्रम अहम कदम माना जा रहा है।