गणपती के नाम के आगे बाप्पा और मोरया क्यों लगता है, जानिए 600 साल पुरानी कहानी
गणेशोत्सव में हर तरफ गूंजने वाले "गणपती बाप्पा मोरया" के नारे के पीछे चिंचवड के संत मोरया गोसावी की भक्ति और करीब छह सदी पुराना इतिहास जुड़ा है।
गणेशोत्सव शुरू होते ही गली-गली, घर-घर और बड़े-बड़े पंडालों में एक ही नारा गूंजता है, गणपती बाप्पा मोरया, अगले वर्ष जल्दी आओ। भाद्रपद महीने की गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाले इस त्योहार में बच्चों से लेकर बड़ों तक सब गणपति की भक्ति में डूब जाते हैं। लेकिन कभी यह सोचा है कि विघ्नहर्ता गणेश के नाम के आगे बाप्पा और मोरया ये दो शब्द कैसे जुड़ गए। इसके पीछे सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि करीब 600 साल पुराना एक इतिहास और भक्ति की दिलचस्प कहानी छिपी है।
महाराष्ट्र में बाप्पा शब्द बड़े आदर और लगाव के साथ बोला जाता है। मराठी संस्कृति में घर के बड़े-बुजुर्ग या परिवार के मुखिया को बाप्पा या बाप कहा जाता है। गणेशभक्त भगवान गणेश को सिर्फ देवता नहीं मानते, बल्कि अपने परिवार का मुखिया, सहारा और संकटमोचक मानते हैं। इसी अपनेपन के चलते गणपति के नाम के साथ बाप्पा शब्द जुड़ गया।
मोरया शब्द का सीधा संबंध महाराष्ट्र के चिंचवड, पुणे के प्रसिद्ध संत और गणेशभक्त श्री मोरया गोसावी से है। ऐतिहासिक जानकारी के मुताबिक 14वीं सदी में, करीब 1375 के आसपास, मोरया गोसावी का जन्म हुआ था। उनके माता-पिता वामन भट और पार्वतीबाई भी गणपति के परम भक्त थे। ऐसा माना जाता है कि उनकी कठोर तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उन्हीं के घर जन्म लेने का वरदान दिया था। मोरया गोसावी बचपन से ही गणपति की भक्ति में लीन रहते थे। वे हर महीने गणेश चतुर्थी के दिन चिंचवड से अष्टविनायकों में से एक मोरगांव के श्री मयूरेश्वर मंदिर के दर्शन के लिए करीब 95 किलोमीटर की दूरी नंगे पांव पैदल तय करते थे। मयूरेश्वर भगवान को मोर पर सवार गणेश का रूप माना जाता है।
मोरया गोसावी ने यह कठिन यात्रा लगातार 117 साल तक बिना रुके जारी रखी। जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई, शरीर थकने लगा और 95 किलोमीटर पैदल चलना उनके लिए मुश्किल होने लगा। अपने प्रिय भक्त की यह मेहनत देखकर भगवान मयूरेश्वर प्रसन्न हुए। एक रात भगवान गणेश ने मोरया गोसावी के सपने में आकर कहा कि अब उन्हें मोरगांव आने की जरूरत नहीं, अगली सुबह जब वे चिंचवड में पवना नदी या तालाब में स्नान करके बाहर निकलेंगे, तब भगवान खुद उनके सामने प्रकट होंगे।
अगली सुबह जब मोरया गोसावी स्नान के लिए तालाब में उतरे और बाहर आए, तो उनके हाथ में भगवान गणेश की एक छोटी और बेहद तेजस्वी मूर्ति खुद-ब-खुद आ गई। यह मूर्ति साक्षात मोरगांव के मयूरेश्वर का ही रूप थी। मोरया गोसावी ने इस मूर्ति की स्थापना चिंचवड में की।
चिंचवड में मूर्ति की स्थापना के बाद दूर-दूर से भक्त उसके दर्शन के लिए आने लगे। लोग जब मोरया गोसावी के दर्शन को जाते, तो मोरया गोसावी गणपती बाप्पा का जाप करते और भक्त उनके सम्मान में मोरया कहकर जवाब देते। धीरे-धीरे भगवान और भक्त का नाम इस कदर एक-दूसरे में घुल-मिल गया कि लोग गणपति का जाप करते वक्त गणपती बाप्पा मोरया एक साथ बोलने लगे। ऐसी मान्यता है कि चिंचवड की गणेश मूर्ति और मोरगांव के मयूरेश्वर में कोई फर्क नहीं है। आज भी मोरया गोसावी के संजीवन समाधि मंदिर से हर साल पालखी मोरगांव के मयूरेश्वर मंदिर की तरफ जाती है। इस तरह एक भक्त की बेमिसाल भक्ति की वजह से भगवान के नाम से पहले उस भक्त का नाम भी अमर हो गया।