गाझा में मासूम बच्चों ने गंवाए हाथ-पैर, जंग के जख्म पूरी जिंदगी का दर्द बने
गाझा में जारी जंग का सबसे दर्दनाक असर छोटे बच्चों पर पड़ रहा है, कई बच्चे हमलों में अपने हाथ-पैर गंवा चुके हैं और अब इलाज व पुनर्वास के सहारे जिंदगी काट रहे हैं।
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गाझा में चल रही जंग ने बच्चों की जिंदगी को सबसे ज्यादा तबाह किया है। बमबारी और हवाई हमलों में जख्मी होने वाले बच्चों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, और मानवीय संस्थाओं का कहना है कि इनमें से कई बच्चों को अपने हाथ या पैर हमेशा के लिए गंवाने पड़े हैं। कल तक जो बच्चे मैदान में दौड़ते थे, दोस्तों के साथ खेलते थे, वही आज अस्पताल के बेड पर इलाज कराते नजर आ रहे हैं।
खेलने और स्कूल जाने की उम्र में इन बच्चों की पूरी जिंदगी बदल गई है। कुछ बच्चों के हाथ या पैर हमेशा के लिए चले गए हैं, जिसकी वजह से चलना, लिखना, खेलना और स्कूल जाना जैसी आम बातें भी अब इनके लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं।
सिर्फ शरीर पर लगी चोटें ही नहीं, इन बच्चों को गहरे मानसिक सदमे से भी गुजरना पड़ रहा है। अपने शरीर का कोई हिस्सा गंवाने के बाद दोबारा सामान्य जिंदगी जीने की जद्दोजहद इनके सामने है। कई बच्चों ने अपनी आंखों के सामने ही अपना घर, परिवार वाले या दोस्त जंग में तबाह होते देखे हैं।
ऐसे हालात में इलाज के साथ-साथ मानसिक सहारे की भी बड़ी जरूरत है। लेकिन गाझा की स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार दबाव में है, इसलिए यह पक्का नहीं कि हर जख्मी बच्चे को जरूरी इलाज मिल ही पाएगा।
हाथ-पैर गंवा चुके बच्चों के लिए आगे का रास्ता और भी मुश्किल है। इन्हें कृत्रिम हाथ-पैर, फिजियोथेरेपी और लंबे समय तक चलने वाले पुनर्वास की जरूरत पड़ती है। उम्र बढ़ने के साथ ही इन कृत्रिम अंगों में समय-समय पर बदलाव भी करना पड़ता है।
जंग खत्म होने के बाद भी इन बच्चों की जिंदगी की जंग खत्म नहीं होगी। इन्हें दोबारा चलना, लिखना और रोजमर्रा की जिंदगी में ढलना सीखने में लंबा वक्त लग सकता है।
गाझा के इन मासूम बच्चों की हालत जंग की इंसानी कीमत की डरावनी याद दिलाती है। जिनके हाथों में खिलौने होने चाहिए थे, उन्हीं हाथों को अब इलाज और पुनर्वास की जरूरत है।