गडचिरोली: पूर्व नक्सली भूपती की गोंडवाना विश्वविद्यालय में नियुक्ति पर विवाद, कुलपति ने दी सफाई
एकल ग्रामसभा प्रशिक्षण केंद्र में समन्वयक पद पर आत्मसमर्पित माओवादी भूपती उर्फ वेणुगोपाल की नियुक्ति पर सवाल उठने के बाद गोंडवाना विश्वविद्यालय के कुलपति ने प्रक्रिया का ब्योरा सामने रखा।
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गडचिरोली में सरेंडर कर चुके माओवादी भूपती उर्फ वेणुगोपाल को गोंडवाना विश्वविद्यालय के एकल ग्रामसभा प्रशिक्षण केंद्र में समन्वयक बनाए जाने का मामला सामने आने के बाद जिले की ग्रामसभाओं में इसका विरोध शुरू हो गया था। इसी विरोध के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को सफाई देनी पड़ी है।
कुलपति डॉ. प्रशांत बोकारे ने बताया कि भूपती की नियुक्ति जाहिरात, कागजातों की जांच और इंटरव्यू की पूरी प्रक्रिया के बाद ही तीन महीने के लिए की गई है। उन्होंने साफ किया कि भूपती को सिर्फ दफ्तर से जुड़ा काम सौंपा गया है, ग्रामसभा या किसी ट्रेनिंग में किसी विषय पर मार्गदर्शन देने की जिम्मेदारी उन्हें नहीं दी गई है।
कुलपति के मुताबिक 9 जुलाई को विश्वविद्यालय की कार्यकारी समिति की बैठक में एकल ग्रामसभा प्रशिक्षण केंद्र के लिए तीन समन्वयक नियुक्त करने का फैसला लिया गया था। इसके बाद 11 अगस्त को समन्वयक पद के लिए सीधे इंटरव्यू की जाहिरात विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर डाली गई। आए हुए आवेदनों की जांच की गई और योग्य उम्मीदवारों के इंटरव्यू लिए गए। 14 अगस्त को प्र-कुलपति डॉ. श्रीराम कावले की अध्यक्षता वाली कमेटी ने इंटरव्यू लिए। इंटरव्यू प्रक्रिया पूरी होने के बाद 29 अगस्त को चयन सूची और प्रतीक्षा सूची विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर जारी की गई। कुलपति डॉ. प्रशांत बोकारे ने बताया कि इसी प्रक्रिया के तहत भूपती को तीन महीने के लिए समन्वयक नियुक्त किया गया।
वहीं जन संघर्ष समिति ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि भूपती को किस योग्यता के आधार पर समन्वयक चुना गया, इसका खुलासा किया जाए। समिति के अध्यक्ष दत्ता शिर्के ने सवाल उठाया कि जिसने चार दशक तक गडचिरोली में दहशत फैलाई, सैकड़ों आम आदिवासियों की हत्या के लिए सीधे या परोक्ष रूप से जिम्मेदार रहा और जिस पर देशद्रोह के आरोप हैं, उस हिंसक भूपती को ग्रामसभाओं को मार्गदर्शन देने की जिम्मेदारी कैसे दी जा सकती है।
माओवादियों की पॉलिट ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी के सदस्य रहे मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू उर्फ भूपती को नक्सल आंदोलन का दिमाग माना जाता रहा है। 2 नवंबर 1980 को गडचिरोली जिले के मोयाबिनपेठा में सीआरपीएफ और माओवादियों के बीच पहली मुठभेड़ हुई थी, जिसमें उस वक्त सिरपुर दलम का माओवादी कमांडर पेद्दी शंकर मारा गया था। इसी घटना में माओवादियों के खिलाफ पहला केस दर्ज हुआ था। इसके बाद 1982 में गडचिरोली जिले के सिरोंचा के पास अमरादी गांव में माओवादियों ने पहली बार किसी आम नागरिक पर हमला किया था, जब उस इलाके के शिक्षक राजू मास्टर का दाहिना हाथ माओवादियों ने काट दिया था।