मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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18:00 IST

दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट के लिए अग्निकुल कॉसमॉस को 200 करोड़ रुपये की सरकारी मदद

अग्निकुल कॉसमॉस को अपना रीयूजेबल रॉकेट 'अग्निबाण आरएलवी' बनाने के लिए तकनीक विकास मंडल से 200 करोड़ रुपये मिले हैं।

दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट के लिए अग्निकुल कॉसमॉस को 200 करोड़ रुपये की सरकारी मदद
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठने जा रहा है। भारतीय स्पेस स्टार्टअप अग्निकुल कॉसमॉस को अपना दोबारा इस्तेमाल होने वाला लॉन्च व्हीकल, यानी रीयूजेबल रॉकेट, बनाने के लिए 200 करोड़ रुपये की सरकारी रकम मिली है। इस प्रोजेक्ट का नाम 'अग्निबाण आरएलवी' रखा गया है। कहा जा रहा है कि इससे दुनिया के स्पेस बाजार में विदेशी कंपनियों को कड़ी टक्कर मिल सकती है।

यह रकम तकनीक विकास मंडल (टीडीबी) और अग्निकुल कॉसमॉस के बीच हुए 200 करोड़ रुपये के करार के तहत दी गई है। पैसा रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन फंड से आ रहा है। इसका मुख्य मकसद देसी तकनीक को बढ़ावा देना है। साथ ही भारत को कमर्शियल स्पेस लॉन्च का ग्लोबल सेंटर बनाना भी इसका लक्ष्य है।

सीधे शब्दों में कहें तो भारत अब एलन मस्क की 'स्पेसएक्स' जैसा रॉकेट बनाने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। ऐसा रॉकेट सैटेलाइट को अंतरिक्ष में छोड़ सकेगा, खुद धरती पर लौट सकेगा और उसे फिर से लॉन्च के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इस सरकारी मदद के सहारे अग्निकुल अपनी मौजूदा तकनीक को टीआरएल-4 (टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल) से सीधे टीआरएल-8 के एडवांस स्तर तक ले जाएगी। इसमें कई हाई-टेक खूबियां शामिल होंगी: दोबारा इस्तेमाल होने वाला ऊपरी स्टेज, सेमी-क्रायोजेनिक लिक्विड प्रोपल्शन, डीप थ्रॉटलिंग, रीस्टार्ट की क्षमता और सटीक लैंडिंग के लिए प्रोपल्शन सिस्टम।

सरकार ने यह 200 करोड़ रुपये का दांव किसी नई और अनजान कंपनी पर नहीं लगाया है। अग्निकुल कॉसमॉस अपनी ताकत पहले ही दिखा चुकी है। कंपनी ने 'अग्निलेट' नाम का इंजन अपनी ही फैक्ट्री में डिजाइन करके बनाया, जो दुनिया का पहला सिंगल-पीस 3D प्रिंटेड रॉकेट इंजन है। मई 2024 में कंपनी ने अपने एक स्टेज वाले व्हीकल अग्निबान SOrTeD की पहली उड़ान कामयाबी से पूरी की थी। टीडीबी इससे पहले भी छोटे सैटेलाइट व्हीकल बनाने में अग्निकुल की मदद कर चुका है।

अग्निकुल का प्रोजेक्ट सिर्फ रॉकेट के पहले स्टेज को धरती पर वापस लाने तक सीमित नहीं है। कंपनी चाहती है कि पूरा लॉन्च सिस्टम जितना हो सके, दोबारा इस्तेमाल के काबिल बने। इससे आगे चलकर रॉकेट लॉन्च की तादाद कई गुना बढ़ जाएगी।

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