बुधवार, 16 सितमबर 2026

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23:27 IST

धारावी: पहली मंजिल के झोपड़ीवासियों को घर मिलेगा या नहीं, 29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

धारावी पुनर्विकास प्रोजेक्ट में पहली मंजिल पर रहने वालों को घर देने से इनकार करने वाले हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ भाजपा के पूर्व सांसद गोपाल शेट्टी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।

धारावी: पहली मंजिल के झोपड़ीवासियों को घर मिलेगा या नहीं, 29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

धारावी पुनर्विकास प्रोजेक्ट में पहली मंजिल पर रहने वाले झोपड़ीवासियों के घर का मसला फिर से सुर्खियों में आ गया है। हाई कोर्ट ने सभी रहिवासियों को एक साथ मुफ्त या पैसे देकर घर देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद भाजपा के पूर्व सांसद गोपाल शेट्टी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। उनकी याचिका पर अब 29 सितंबर को सुनवाई होने वाली है।

गोपाल शेट्टी ने पहली मंजिल पर रहने वाले झोपड़ीवासियों को पुनर्वसन का फायदा देने की मांग को लेकर पहले हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। लेकिन हाई कोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। पिछले हफ्ते इस याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें राज्य सरकार ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। अब अगली सुनवाई के लिए 29 सितंबर की तारीख तय की गई है, जिस पर हजारों रहिवासियों की नजर टिकी है।

बताया जा रहा है कि धारावी पुनर्विकास प्रोजेक्ट में बहुमंजिला झोपड़ियों में रहने वाले कुछ लोगों को पैसे देकर या किराए पर घर देने का प्रावधान है। लेकिन मूल झोपड़पट्टी पुनर्वसन योजना में पहली मंजिल पर रहने वालों को यह फायदा देने के लिए सरकार तैयार नहीं है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि एक ही मुंबई शहर में पुनर्वसन के लिए दो अलग-अलग नियम क्यों लागू किए जा रहे हैं। शेट्टी की याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि धारावी पुनर्वसन योजना में जब रहिवासियों को घर का फायदा मिल रहा है, तो दूसरी झोपड़पट्टी पुनर्वसन योजनाओं में पहली मंजिल पर रहने वालों को घर देने में क्या दिक्कत है।

हाई कोर्ट ने साफ कहा था कि पहली मंजिल के सभी झोपड़ीवासियों को घर देने का फैसला एक पॉलिसी का मामला है, और जब तक यह फैसला संविधान के खिलाफ साबित नहीं होता, तब तक कोर्ट को पॉलिसी के मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। लेकिन इस फैसले से पहली मंजिल पर रहने वाले हजारों परिवारों को पक्का घर मिलेगा या नहीं, इसका सवाल अभी भी बना हुआ है।

मुंबई के कई इलाकों में 30 से 40 साल पहले प्राइवेट जमीनों पर चालें बनाई गई थीं। कुछ रहिवासियों ने बड़ी रकम देकर ये घर खरीदे थे। बाद में इन चालों को झोपड़पट्टी पुनर्वसन योजना के तहत लाया गया। झोपु अथॉरिटी का कहना है कि झोपड़पट्टी पुनर्वसन कानून में पहली मंजिल पर रहने वालों के लिए साफ प्रावधान न होने की वजह से उन्हें मुफ्त या पैसे देकर घर का फायदा नहीं दिया जा सकता। इस वजह से मुंबई के उपनगरों में ऐसे कई रहिवासियों के सामने पुनर्वसन का गंभीर सवाल खड़ा हो गया है।

गोपाल शेट्टी शुरू से इस मुद्दे पर पीछा करते रहे हैं। उस वक्त की महाविकास आघाड़ी सरकार ने पहली मंजिल पर रहने वालों को घर देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद 2021 में उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया था। 2024 में इस मामले में बिना कोई ठोस फैसला दिए केस रद्द कर दिया गया था। इसके बाद शेट्टी ने राज्य सरकार और संबंधित अथॉरिटी को कई पत्र लिखकर इन रहिवासियों के बारे में सहानुभूति से सोचने की मांग की।

पहले पहली मंजिल पर रहने वालों को कुछ शर्तों पर घर देने के विकल्प भी सामने रखे गए थे। प्रस्ताव में यह सुझाव दिया गया था कि 1 जनवरी 1976 तक की चालों या झोपड़पट्टियों को फायदा देने पर विचार किया जा सकता है, और साथ ही योग्य रहिवासियों को प्रधानमंत्री आवास योजना के नियमों के मुताबिक घर देने की संभावना भी देखी जा सकती है। इसके अलावा झोपु योजनाओं में प्रोजेक्ट से प्रभावित लोगों के लिए उपलब्ध फ्लैट या दूसरी हाउसिंग स्कीमों के घर देने का विकल्प भी रखा गया था। लेकिन उस वक्त की राज्य सरकार ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था।

अब 29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है, इस पर पहली मंजिल पर रहने वाले रहिवासियों समेत मुंबई के पुनर्वसन के सवाल से जुड़े सभी लोगों की नजर टिकी है।

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