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01:23 IST

बर्फ पिघला तो आर्कटिक पर टकराव, 12 यूरोपीय देशों ने ताकत बढ़ाने की मांग की

रूस की बढ़ती सैन्य मौजूदगी और ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के रुख से आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक राजनीति का नया अखाड़ा बनता जा रहा है, जिस पर डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और ग्रीस सहित 12 यूरोपीय देशों ने यूरोपीय संघ से मजबूत मौजूदगी की मांग की है।

बर्फ पिघला तो आर्कटिक पर टकराव, 12 यूरोपीय देशों ने ताकत बढ़ाने की मांग की
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

बर्फ से ढंका आर्कटिक क्षेत्र अब सिर्फ पर्यावरण और मौसम बदलाव का मसला नहीं रह गया। इस इलाके में रूस की बढ़ती सैन्य ताकत, अमेरिका की रणनीतिक भूमिका और ग्रीनलैंड को लेकर बना तनाव इसे दुनिया की राजनीति का नया हॉटस्पॉट बना रहे हैं।

इसी माहौल में डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और ग्रीस समेत 12 यूरोपीय देशों ने मांग की है कि यूरोपीय संघ आर्कटिक में अपनी मौजूदगी और सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करे।

आर्कटिक में रूस की सैन्य और रणनीतिक मौजूदगी पहले से ही बड़ी है। रूस ने इस इलाके में सैन्य ठिकानों, बुनियादी ढांचे और समुद्री रास्तों पर खास फोकस किया है, जिसकी वजह से यूरोपीय देशों को अपनी उत्तरी सीमा की सुरक्षा पर नए सिरे से सोचना पड़ रहा है।

आर्कटिक का महत्व सिर्फ सैन्य नजरिए से नहीं है। बर्फ पिघलने की वजह से इस इलाके के समुद्री रास्तों का इस्तेमाल लंबे समय तक हो सकेगा, ऐसी संभावना बढ़ रही है। इसके अलावा तेल, गैस और तरह-तरह के खनिज संसाधनों की वजह से भी दुनिया की बड़ी ताकतों की नजर आर्कटिक पर टिकी है। आगे चलकर इस इलाके में आर्थिक और सामरिक होड़ और तेज होने की आशंका है।

इस पूरे समीकरण में ग्रीनलैंड का मुद्दा बहुत अहम बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार ग्रीनलैंड के रणनीतिक महत्व पर जोर देते रहे हैं। ग्रीनलैंड डेनमार्क के स्वायत्त नियंत्रण में है, इसलिए अमेरिका के इस रुख से यूरोप में चिंता बढ़ी है।

ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अमेरिका, यूरोप और आर्कटिक के समुद्री रास्तों के लिहाज से बेहद अहम है। आने वाले समय में खनिज संपदा, नए व्यापारिक रास्ते और सैन्य गतिविधियों की वजह से इस द्वीप का महत्व और बढ़ सकता है। यही वजह है कि यूरोप को आर्कटिक में अपना दबदबा बनाए रखने की जरूरत महसूस हो रही है।

फिनलैंड में हुई चर्चाओं में आर्कटिक की सुरक्षा को यूरोप की व्यापक सुरक्षा से जोड़ने पर जोर दिया गया। इन 12 देशों ने मांग रखी है कि यूरोपीय संघ इस क्षेत्र में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाए। सुरक्षा, बुनियादी ढांचे, पर्यावरण, व्यापार और स्थानीय समुदायों के विकास पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत भी जताई गई।

आर्कटिक में यूरोप की मौजूदगी बढ़ाने का मतलब सिर्फ सेना तैनात करना नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी, बुनियादी ढांचा और आर्थिक निवेश बढ़ाना भी है। ऐसे में आगे चलकर आर्कटिक में अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच होड़ और तेज होने की संभावना है। बर्फ से ढंका यह इलाका अब महाशक्तियों के पावर गेम का नया मंच बनता दिख रहा है।

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