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00:53 IST

'अडकित्ता' रिव्यू: पालकत्व, भरोसा और रिश्तों की उलझन में सई ताम्हणकर

ZEE5 पर आई मराठी फिल्म 'अडकित्ता' पालकत्व, भरोसे और रिश्तों की उलझी हुई कहानी दिखाती है, जिसमें सई ताम्हणकर, सिद्धार्थ चांदेकर और सखी गोखले की भूमिकाएं हैं।

'अडकित्ता' रिव्यू: पालकत्व, भरोसा और रिश्तों की उलझन में सई ताम्हणकर
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

आजकल के भागदौड़ भरे जीवन में करियर और घर-परिवार की जिम्मेदारी एक साथ संभालना आसान नहीं रहा। यही मुद्दा नए ढंग से उठाने वाली मराठी फिल्म 'अडकित्ता' ZEE5 पर रिलीज हुई है। फिल्म का नाम भी कहानी से पूरी तरह मेल खाता है, क्योंकि इसके किरदार रिश्तों, जिम्मेदारियों, भरोसे और भावनाओं की ऐसी ही एक उलझन में फंसते नजर आते हैं।

कहानी के केंद्र में एक सवाल है - बच्चे को जन्म देने वाली मां बड़ी होती है या उसकी परवरिश करने वाली? लेकिन इसके साथ ही फिल्म मां के मन की गिल्ट, बच्चा खोने का दर्द और पालकत्व की भावनात्मक उठापटक को भी सामने लाती है। पूरी कहानी तीन किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है - गौतम (सिद्धार्थ चांदेकर), कस्तुरी (सखी गोखले) और मंगल (सई ताम्हणकर)।

फिल्म की शुरुआत कस्तुरी और गौतम से होती है, जो दोनों वर्किंग कपल हैं, अपने-अपने विचारों में स्वतंत्र, करियर को अहमियत देने वाले और अपने शहर से दूर रहने वाले। एक पार्टी में कस्तुरी को पता चलता है कि वो मां बनने वाली है, और यहीं से उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव शुरू होता है। प्रेग्नेंसी के आठवें महीने में कस्तुरी के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी होती है - पता चलता है कि उसे जुड़वां बच्चे हैं, लेकिन उनमें से एक बच्चे की जन्म से पहले ही मौत हो जाती है। कस्तुरी और दूसरे बच्चे की जान को भी खतरा पैदा हो जाता है। डॉक्टरों की कोशिशों के बाद दोनों बच जाते हैं और कस्तुरी एक बेटे को जन्म देती है, जिसका नाम रखा जाता है ओंकार।

लेकिन ओंकार के जन्म के बाद ही कस्तुरी और गौतम की असली परीक्षा शुरू होती है। करियर और पालकत्व के बीच बैलेंस बनाते हुए दोनों को कई सवालों से जूझना पड़ता है, और काम की जिम्मेदारी संभालते हुए बच्चे की देखभाल के लिए उन्हें बाहर से मदद लेनी पड़ती है। यहीं ओंकार की देखभाल के लिए मंगल उनकी जिंदगी में आती है। शुरुआत में उसकी मौजूदगी कस्तुरी और गौतम के लिए बड़ा सहारा बनती है, लेकिन धीरे-धीरे दोनों का उस पर भरोसा और निर्भरता बढ़ती जाती है। ओंकार और मंगल के बीच भी नजदीकी बढ़ने लगती है।

यहां से कहानी सिर्फ पालकत्व तक सीमित नहीं रहती। घर में किसी बाहरी इंसान पर कितना भरोसा करना चाहिए, उस पर निर्भर रहने की भी कोई सीमा होती है क्या, और वो सीमा पार हो जाए तो रिश्तों में क्या बदलाव आ सकता है - फिल्म इन्हीं सवालों को आगे ले जाती है। मंगल के किरदार में जो दिखता है उससे कहीं ज्यादा कुछ छुपा है, यही बात कहानी को अलग बनाती है। उसकी जिंदगी में एक बड़ा दुखद हादसा हुआ है जो उसके स्वभाव को एक अलग पहलू देता है - बेटे को खोने के बाद वो टूट जाती है और उसका पति भी उसे छोड़ जाता है, फिर भी वो खुद को संभालती है और दोबारा जिंदगी शुरू करने की कोशिश करती है।

फिल्म की एक अहम बात है मां की भावनाओं का चित्रण - चाहे वो नई-नई मां बनी औरत के मन की गिल्ट हो या बच्चा खोने के बाद एक मां का दर्द, फिल्म इन भावनाओं को गंभीरता से पेश करती है। मंगल और कस्तुरी की परिस्थितियां अलग-अलग होते हुए भी दोनों मातृत्व की भावना से जुड़ी हैं, इसलिए ओंकार के साथ मंगल की बढ़ती नजदीकी कस्तुरी को बेचैन करती है और घर का माहौल बदलने लगता है।

फिल्म का डायरेक्शन आशुतोष निखिल परंधकर ने किया है, जिनकी बतौर डायरेक्टर यह पहली फिल्म है। फिल्म में बड़े उतार-चढ़ाव या लगातार झटके देने वाले सीन नहीं हैं, फिर भी कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए दर्शकों को बांधे रखती है। सई ताम्हणकर ने मंगल का किरदार निभाया है - पैसों की जरूरत वाली, दिल से दयालु और संवेदनशील औरत, जो जिंदगी के सबसे दुखद पल का सामना करने के बाद भी अपनी इंसानियत नहीं खोती। सिद्धार्थ चांदेकर ने गौतम के किरदार में पत्नी का साथ देने वाला, स्त्री-पुरुष बराबरी में यकीन रखने वाला और बच्चे के जन्म के बाद घर में बैलेंस बनाने की कोशिश करने वाला बाप निभाया है। सखी गोखले ने कस्तुरी के जरिए एक नई मां के मन की कई भावनाएं सामने लाई हैं।

फिल्म में म्यूजिक का भी अच्छा इस्तेमाल किया गया है, गाने शांत और भावनात्मक हैं जो कहानी के मूड को दिखाने में मदद करते हैं। एक खबर के बाद कस्तुरी और गौतम मंगल पर नजर रखने के लिए घर में सीसीटीवी लगवाने का फैसला करते हैं, जिसके बाद गौतम करीब एक महीने तक मंगल पर नजर रखता है। यहीं से सवाल उठता है कि जिस इंसान पर बच्चे की जिम्मेदारी सौंपी गई है, क्या उस पर भरोसा अब भी उतना ही है? फिल्म जैसे-जैसे अंत की तरफ बढ़ती है, रिश्तों की उलझन और गहरी होती जाती है, और आखिर में कहानी उम्मीद से अलग मोड़ लेती है।

'अडकित्ता' हर दर्शक को पसंद आएगी ऐसा नहीं है, यह बड़े मनोरंजन या लगातार थ्रिल देने वाली फिल्म नहीं है। लेकिन इंसानी भावनाओं, मातृत्व, मां के मन की गिल्ट, बच्चा खोने का दर्द, भरोसे और रिश्तों की असुरक्षा को ईमानदारी से दिखाने वाली फिल्म जरूर है। अगर बड़े ट्विस्ट और ओवर ड्रामा से बचते हुए इंसानी रिश्तों की भावनाएं दिखाने वाली अलग कहानी देखनी हो, तो 'अडकित्ता' को एक मौका दिया जा सकता है।

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