४ अक्टूबर को विश्व पशु दिवस: बर्लिन से फ्लोरेंस तक कैसे शुरू हुआ यह दिन
हर साल ४ अक्टूबर को मनाए जाने वाले विश्व पशु दिवस की शुरुआत १९२५ में बर्लिन में हुई थी, और १९३१ में फ्लोरेंस की परिषद में इसकी तारीख तय हुई।
इस खूबसूरत धरती पर जितना हक इंसान का है, उतना ही बाकी सभी जीवों का भी है। परिंदे हों, पानी में रहने वाले जीव हों या जमीन पर चलने वाले जानवर, इनके बिना इस धरती की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इंसान की जिंदगी को भरपूर और संतुलित रखने में जानवर बहुत अहम रोल निभाते हैं। लेकिन तरक्की और आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ में इंसान ने कुदरत के इन बेगुनाह हिस्सों पर कुछ हद तक ध्यान देना छोड़ दिया है। इन्हीं बेजुबान जानवरों के हक, उनकी भलाई और उनके संरक्षण को लेकर दुनिया भर में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल ४ अक्टूबर को 'विश्व पशु दिवस' (World Animal Day) पूरी गंभीरता और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
इस दिन की शुरुआत १९२५ में हेनरिक झिमरमन (Heinrich Zimmermann) ने की थी। वे जानवरों से प्यार करने वाले इंसान और लेखक थे। उन्होंने जर्मनी के बर्लिन में २४ मार्च १९२५ को पहला पशु दिवस आयोजित किया था।
इसके बाद १९३१ में इटली के फ्लोरेंस शहर में अंतरराष्ट्रीय पशु संरक्षण परिषद हुई। उसी परिषद में ४ अक्टूबर को आधिकारिक तौर पर 'विश्व पशु दिवस' घोषित किया गया। इस तारीख को चुने जाने की एक और खास वजह है। ४ अक्टूबर को संत फ्रांसिस ऑफ असीसी (St. Francis of Assisi) की पुण्यतिथि पड़ती है, जिन्हें जानवरों का रक्षक माना जाता है। तभी से दुनिया भर के पशुप्रेमी और अलग-अलग संस्थाएं मिलकर यह दिन मनाती हैं।
चाहे आसमान में उड़ने वाला छोटा सा परिंदा हो, जंगल का खूंखार जानवर हो या गली-मोहल्ले में घूमने वाला आवारा जानवर, हर एक कुदरत की फूड चेन (Food Chain) की अहम कड़ी है। पेड़ों के बीज फैलाने से लेकर जमीन की उपजाऊ ताकत बढ़ाने और कीड़ों की तादाद काबू में रखने तक, जानवरों का परोक्ष योगदान बेमिसाल है। अगर कुदरत की एक भी प्रजाति खत्म हो जाए, तो उसका सीधा बुरा असर पूरे इकोसिस्टम (Ecosystem) पर पड़ता है और आखिर में इंसानी जिंदगी के लिए भी बड़ा खतरा खड़ा हो जाता है।
अफसोस की बात है कि आज का इंसान अपने पल भर के फायदे के लिए कुदरत को बर्बाद कर रहा है। बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई, बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, प्लास्टिक प्रदूषण और गैरकानूनी शिकार की वजह से हजारों वन्यजीवों के प्राकृतिक ठिकाने (Habitats) खत्म हो गए हैं। इसी वजह से कई दुर्लभ प्रजातियां आज खत्म होने की कगार पर हैं। इसके अलावा शहरों में आवारा जानवरों पर होने वाला अत्याचार और उनकी अनदेखी भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बन गई है। विश्व पशु दिवस हमें इन सब हालात पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर करता है।
इस दिन दुनिया भर के स्कूल, कॉलेज, स्वयंसेवी संस्थाएं (NGOs) और सरकारी विभाग चर्चासत्र, रैलियां और जागरूकता अभियान आयोजित करते हैं। लेकिन जागरूकता सिर्फ एक दिन तक सीमित न रहे, इसलिए हर किसी को रोज की जिंदगी में कुछ छोटी बातें अपनानी चाहिए। आसपास के आवारा जानवरों को परेशान न करें, उनके लिए पीने के पानी और खाने का इंतजाम करें। प्लास्टिक का इस्तेमाल टालें, क्योंकि प्लास्टिक का कचरा वन्यजीवों और जलचरों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। जानवर खरीदने के बजाय आवारा जानवरों या शेल्टर के जानवरों को गोद लेने को तरजीह दें। और जानवरों पर किसी भी तरह का अत्याचार दिखे, तो फौरन पशु संरक्षण संस्था या पुलिस से शिकायत करें।
आखिर में महात्मा गांधी के शब्दों में, "किसी राष्ट्र की महानता और उसकी नैतिक प्रगति इससे तय होती है कि वहां जानवरों के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है।" इसलिए आज विश्व पशु दिवस पर हम सब संकल्प लें कि इन बेजुबान जीवों के साथ करुणा, प्यार और पूरी जिम्मेदारी से पेश आएंगे और धरती को सभी जीवों के लिए महफूज घर बनाएंगे।