गडकरी-फडणवीस का दम, फिर भी वंजारी के आगे भाजपा बेदम!
संघ के गढ़ में भाजपा चारों खाने चित, वंजारी की जीत से गडकरी-फडणवीस को झटका, भाजपा के शक्ति प्रदर्शन पर कांग्रेस का पलटवार, कराले गुरुजी ने बिगाड़ा खेल
नागपुर :
देश और राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा को उसके सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ नागपुर में कांग्रेस ने करारा झटका दिया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय वाले शहर में स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की जंग बन गया था. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से लेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तक ने भाजपा प्रत्याशी सुधाकर कोहले की जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने तमाम राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त करते हुए लगातार दूसरी बार जीत का परचम लहरा दिया. इस नतीजे ने भाजपा के चुनावी प्रबंधन और दिग्गज नेताओं की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. कराले गुरुजी को मिले दूसरी पसंद के मतों ने कोहले की लंका लगा दी.
भाजपा ने झोंकी पूरी ताकत, फिर भी हाथ लगी शिकस्त!
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव भाजपा के लिए महज एक सीट जीतने का मुकाबला नहीं था. पार्टी इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर चल रही थी. सुधाकर कोहले की जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने संगठन से लेकर सत्ता के गलियारों तक पूरी ताकत लगा दी थी. गडकरी और फडणवीस की सक्रियता से भाजपा समर्थकों को भारी जीत की उम्मीद थी. दावा था कि कोहले बड़े अंतर से वंजारी को पराजित करेंगे, लेकिन नतीजा इसके उलट निकला. कांग्रेस ने भाजपा की तमाम तैयारियों को मात देते हुए बाजी अपने नाम कर ली.
बगावत ने भाजपा के भीतर मचाई थी खलबली
चुनाव की घोषणा होते ही भाजपा के भीतर असंतोष की चिंगारी भड़क उठी थी. शिक्षक सहकारी बैंक के अध्यक्ष अनिल सोले ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर पार्टी नेतृत्व के सामने चुनौती खड़ी कर दी. भाजपा और संघ से जुड़े माने जाने वाले सोले के इस कदम ने चुनावी समीकरण बिगाड़ने की आशंका बढ़ा दी.
मामला यहीं नहीं थमा. जनसंघ के संस्थापक बच्छराज व्यास के पुत्र और पूर्व विधायक गिरीश व्यास ने भी सोले का समर्थन करते हुए पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. एक तरफ कांग्रेस चुनावी मैदान में मजबूती से डटी थी, तो दूसरी तरफ भाजपा को अपने ही खेमे में उठे असंतोष से निपटना पड़ रहा था.
डैमेज कंट्रोल के लिए खुद मैदान में उतरे फडणवीस
भाजपा के भीतर बढ़ते असंतोष को देखते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा. वे विमान से नागपुर पहुंचे और अनिल सोले तथा गिरीश व्यास को मनाने की कवायद शुरू की. काफी प्रयासों के बाद सोले ने उम्मीदवारी वापस ली और गिरीश व्यास ने भी अपना इस्तीफा वापस ले लिया. इस घटनाक्रम के बाद भाजपा नेतृत्व ने राहत की सांस ली. उम्मीद थी कि बगावत का संकट टलने से कोहले की जीत का रास्ता आसान हो जाएगा. लेकिन चुनाव परिणाम ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. अंदरूनी असंतोष को शांत करने में कामयाबी के बावजूद पार्टी मतदाताओं का भरोसा जीतने में सफल नहीं हो सकी.
सतीश चतुर्वेदी भी उतरे, फिर भी नहीं बची भाजपा की साख!
सुधाकर कोहले के समर्थन में राज्य के पूर्व मंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता सतीश चतुर्वेदी भी सक्रिय हुए. उन्होंने पार्टी लाइन से हटकर कोहले के पक्ष में बैठक तक आयोजित की. इसके बावजूद कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने अपनी जीत दोहराकर भाजपा को करारा राजनीतिक जवाब दिया. चुनाव में सत्ता, संगठन और दिग्गज नेताओं की सक्रियता के बावजूद कांग्रेस की जीत ने यह संकेत दिया कि स्थानीय चुनावों में केवल राजनीतिक ताकत के दम पर जीत की गारंटी नहीं मिलती.
मतगणना के अंतिम दौर तक धड़कनें तेज
मंगलवार रात से ही मतगणना केंद्र पर राजनीतिक सरगर्मी तेज थी. कांग्रेस कार्यकर्ता लगातार नारेबाजी कर माहौल गर्माए हुए थे. बुधवार सुबह से मतों के अंतर में उतार-चढ़ाव के चलते दोनों खेमों की निगाहें परिणाम पर टिकी थीं. जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, उत्सुकता और बेचैनी भी बढ़ती गई.
बुधवार शाम करीब सात बजे तस्वीर साफ होते ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हुजूम मतगणना केंद्र पर उमड़ पड़ा. नारों की गूंज के बीच वंजारी की जीत का जश्न शुरू हो गया.
15 हजार मतों पर विवाद ने बढ़ाई चुनावी सरगर्मी
मतगणना के दौरान अवैध घोषित किए गए 15 हजार मतों को दोबारा गिनने की भाजपा की मांग को चुनाव अधिकारियों द्वारा ठुकराए जाने का मुद्दा भी सामने आया है. यह घटनाक्रम चुनाव परिणाम को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है. हालांकि, इन मतों का अंतिम परिणाम पर क्या प्रभाव पड़ सकता था, इस बारे में आधिकारिक आंकड़ों और चुनाव अधिकारियों के विवरण की पुष्टि आवश्यक है.
भाजपा के लिए अब सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि तमाम दिग्गज नेताओं की सक्रियता और संगठनात्मक प्रयासों के बावजूद पार्टी को हार का सामना क्यों करना पड़ा. वहीं वंजारी की लगातार दूसरी जीत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया उत्साह पैदा किया है. कांग्रेस इस जीत को नागपुर में अपनी राजनीतिक ताकत के प्रदर्शन के रूप में पेश कर सकती है।
स्नातक चुनाव का संदेश साफ है, भाजपा के मजबूत गढ़ में भी कांग्रेस ने चुनौती देने की अपनी क्षमता साबित की है. अब देखना होगा कि इस चुनावी झटके से भाजपा क्या सबक लेती है और इसका असर नागपुर की आगामी स्थानीय राजनीति पर कितना पड़ता है.
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