सासवड के पूर्व प्राचार्य का वोटिंग बूथ 17 किमी दूर राजेवाडी पहुंचा, अफसर बोले- लाने-ले जाने का इंतजाम करेंगे
पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव के लिए बनी वोटर लिस्ट में कई गंभीर गड़बड़ियां मिलने की बात मतदाता कह रहे हैं। इसका एक उदाहरण संजय मेहेत्रे हैं, जो पुणे के गरवारे महाविद्यालय से प्राचार्य के पद से रिटायर हुए और अब अपने पुश्तैनी गांव सासवड में बस गए हैं। एक जगह उन्हें गरवारे हाईस्कूल से प्रधानाध्यापक के तौर पर रिटायर हुआ बताया गया है। वे पिछले आठ साल से सासवड में रह रहे हैं।
मेहेत्रे और उनकी पत्नी ने स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के लिए अपना नाम दर्ज कराया था। जब शुरुआती लिस्ट आई, तब उनका नाम सासवड केंद्र पर ही था और उनका क्रमांक 848 था। लेकिन ऐन वक्त पर फाइनल लिस्ट आई तो उनका नाम सासवड से 16 से 17 किलोमीटर दूर राजेवाडी गांव के मतदान केंद्र पर डाल दिया गया था।
यह बात ध्यान में आते ही मेहेत्रे सासवड में चुनाव शाखा के नायब तहसीलदार के पास गए। उनके मुताबिक दो दिन तक उन्हें मिलने का वक्त ही नहीं दिया गया। फिर संबंधित अधिकारियों से बात हुई, पर कोई ठीक मदद नहीं मिली। इसके बाद वे सीधे तहसीलदार विक्रम राजपूत के पास पहुंचे। तहसीलदार ने कहा कि अब प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं होगा और हाथ खड़े कर दिए। यही नहीं, अधिकारियों ने मतदान केंद्र तक लाने-ले जाने का इंतजाम करने का अजीब भरोसा भी दिया।
मेहेत्रे का कहना है कि यह सिर्फ एक आदमी की समस्या नहीं है। सासवड की शुरुआती लिस्ट में जो करीब 100 से 200 नाम थे, वे ऐन वक्त पर दूर के गांवों में भेज दिए गए। उनके मुताबिक लिस्ट देखें तो बहुत सारे नाम इसी तरह शिफ्ट हुए हैं। वे कहते हैं कि वोट किसे देना है, यह हमारा अधिकार है, पर हमें इससे वंचित रखा जा रहा है और इस पर अधिकारी जवाब नहीं देते।
उनका कहना है कि एक बूथ पर वोटर ज्यादा हो गए थे तो स्थानीय स्तर पर नया बूथ बनाना चाहिए था। उसकी जगह सीधे नाम दूसरे गांव में धकेल देना गलत है। मेहेत्रे ने तीखी प्रतिक्रिया में कहा, "हमें किसी के एहसान या लाने-ले जाने की सुविधा की जरूरत नहीं है। हमारा वोट देने का अधिकार हमारा हक है। सासवड में आसानी से नया बूथ बनाया जा सकता था, लेकिन प्रशासन ने जानबूझकर यह लापरवाही की है।"
उन्हें डर है कि इस तरह की मनमानी और लंबी दूरी की वजह से कई मतदाता वोट डालने से वंचित रह सकते हैं, जिसका असर वोटिंग के प्रतिशत पर भी पड़ेगा। सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर एक रिटायर्ड प्राचार्य को वोट डालने में ऐसी दिक्कतों से गुजरना पड़ रहा है, तो आम लोगों का क्या होगा।
इस बारे में पुरंदर के तहसीलदार विक्रम राजपूत को कई बार फोन किया गया, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।
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