पुरंदर एयरपोर्ट: जमीन के मुआवजे पर रात के लेन-देन के आरोप, अफसर ने कहा कोई और मकसद नहीं
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पुरंदर तालुका में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के लिए जमीन अधिग्रहण का काम अब आखिरी दौर में पहुंच गया है। ठीक इसी वक्त मुआवजे के बंटवारे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। आरोप है कि दिन में किसानों की सहमति, आपत्तियों और दावों पर सुनवाई होती है और रात में सरकारी विश्रामगृह में कुछ किसानों को सीधे मुआवजा बांट दिया जाता है। तालुका में इस बात की चर्चा चल रही है, लेकिन भूसंपादन अधिकारी और अतिरिक्त जिलाधिकारी कल्याण पांढरे ने ये आरोप खारिज कर दिए हैं। इन आरोपों की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
एयरपोर्ट प्रोजेक्ट के लिए पुरंदर तालुका के सात गांवों की करीब तीन हजार एकड़ जमीन ली जा रही है। ये गांव हैं वनपुरी, उदाचीवाडी, कुंभारवळण, खानवडी, एखतपूर, मुंजवडी और पारगाव। बताया जा रहा है कि इसमें से 90 प्रतिशत से ज्यादा अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। प्रोजेक्ट से प्रभावित किसानों को दस प्रतिशत मुआवजा देने के लिए वनपुरी-उदाचीवाडी की करीब 625 एकड़ जमीन का अलग से अधिग्रहण चल रहा है।
प्रक्रिया अटकने की एक बड़ी वजह कई परिवारों में जमीन के बंटवारे को लेकर चल रहे आपसी झगड़े हैं। भाई, बहन, बुआ, मामा, चचेरे भाई, दामाद या बेटियां, इनके बीच हक और हिस्से पर सहमति नहीं बन पा रही। इसी वजह से कुछ परिवार कोर्ट तक पहुंच गए हैं और कई मामलों में सहमति मिलने में देर हो रही है। इसी बीच यह आरोप भी लग रहे हैं कि कुछ मामलों में बिचौलियों और वकीलों के जरिए सीधे मुआवजा हासिल करने की कोशिश हो रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि दिन में दावों और आपत्तियों की सुनवाई होती है और रात में कुछ मामलों के मुआवजे का लेन-देन सरकारी विश्रामगृह में होने की चर्चा है।
इन आरोपों पर कल्याण पांढरे ने सफाई दी। उनके मुताबिक कई किसानों के मन में एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को लेकर शंकाएं हैं। जो मुआवजा मिला है, उसका इस्तेमाल कैसे करें, इस बारे में सलाह लेने भी किसान उनसे मिलने आते हैं। उन्होंने बताया कि सरकारी काम का वक्त खत्म होने के बाद भी किसान बड़ी संख्या में आते हैं और आग्रह करते हैं, इसलिए वे रुककर उनकी शंकाओं और सवालों का जवाब देते हैं।
पांढरे ने कहा, "शाम छह बजे तक काम का वक्त है, फिर भी किसानों के सवालों की वजह से देर तक मार्गदर्शन करना पड़ता है। इसके पीछे कोई और मकसद नहीं है। बाकी किसान जल्द से जल्द सहमति देकर सरकार का सहयोग करें।"
फिलहाल अधिग्रहण प्रक्रिया को लेकर लगे आरोपों की कोई आधिकारिक जांच नहीं हुई है और किसी गड़बड़ लेन-देन पर कोई ठोस नतीजा भी सामने नहीं आया है। ऐसे में प्रशासन की तरफ से आधिकारिक स्पष्टीकरण या जांच को लेकर उसका रुख अहम रहेगा।
एक और आरोप एक स्थानीय पत्रकार पर लगा है, जो अधिग्रहण प्रक्रिया की जानकारी देते हैं। आरोप है कि वे अधिकारियों के संपर्क में रहकर आंदोलन, शिकायत और विरोध करने वालों की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाते हैं। दावा है कि कुछ लोग उन्हें 'खबरी' कहते हैं। इस आरोप की भी कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं है, इसलिए इसे आरोप ही माना जाना चाहिए।
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